कर्नाटक का गौरव: सदियों पहले निर्मित 57 फुट ऊंची प्रतिमा, कम ही लोग जानते हैं कथा

बेंगलूरू से कोई 150 कि.मी. दूर हासन जिले में स्थित है श्रावणबेलागोला। यहां एक झील है जिसे श्वेत (बिली) झील (गोला) कहते हैं। इसी से इस स्थान का नाम पड़ा है। दो पथरीले पहाड़ चंद्रगिरी और विंध्यागिरी भी यहां हैं जिनका संबंध प्राचीन चंद्रगुप्त मौर्य राजवंश के साथ है।
कौन थे चंद्रगुप्त मौर्य के आध्यात्मिक गुरु?
अधिकतर लोग जानते हैं कि किस प्रकार एक चतुर ब्राह्मण चाणक्य ने चंद्रगुप्त को एक सेना तैयार करके नंद सम्राट का तख्तापलट करने और मौर्य साम्राज्य खड़ा करने में मदद की जिसकी राजधानी पाटलीपुत्र थी। चंद्रगुप्त के भय से ही सिकंदर की सेना अपने विश्व विजय अभियान को आगे नहीं बढ़ा सकी थी।

लेकिन कम ही लोग चंद्रगुप्त के आध्यात्मिक गुरु एक जैन संत भद्रबाहू के बारे में जानते हैं। बड़े अकाल के बाद दुनियावी बातों से चंद्रगुप्त का मोहभंग हो गया। सिंहासन अपने बेटे बिंदुसार को सौंप कर वह जैन साधु बन कर दक्षिण की ओर कर्नाटक आकर उन पथरीली पहाडिय़ों के पास रहने लगे, बाद में जिनका नाम उनके नाम पर चंद्रगिरी पड़ गया।

यहीं भद्रबाहू तथा बाद में चंद्रगुप्त ने सल्लेखना किया। जैन धर्म में इसके तहत जीवन में सभी प्रकार का भोजन त्याग दिया जाता है और स्वेच्छा से भौतिक शरीर को छोड़ दिया जाता है। इसे जैन धर्म में सर्वोच्च त्याग माना जाता है। यह 2300 वर्ष पहले हुआ। चंद्रगिरी पहाडिय़ों में भद्रबाहू को समर्पित एक गुफा तथा चंद्रगुप्त को समर्पित एक बसाड़ी यानी जैन मंदिर है। साथ ही वहां विभिन्न जैन तीर्थंकरों व उनकी सुरक्षा करने वाले यक्ष व यक्षनियों के लिए बने विभिन्न स्मारक हैं।

विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा
इसके सामने की पहाड़ी विंध्यागिरी पर बिना आधार वाली विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा स्थित है। 57 फुट ऊंची गोमतेश्वर बाहुबली की इस प्रतिमा को प्रत्येक 12 वर्ष बाद दूध तथा सुगंधित जल से नहलाया जाता है। इस प्रतिमा को करीब 1 हजार वर्ष पूर्व चावुनदराय के लिए तैयार किया गया था जिसका आग्रह उनकी मां ने किया था।
चावुनदराय पश्चिम गंगा का सेनापति था जो राष्ट्रकूट राजाओं के सामंत थे। उन्होंने गंगा वंश की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मध्यकालीन कर्नाटक के इतिहास में वह एक बेहद प्रभावशाली व्यक्तित्व हैं जिन्हें साहित्य का रक्षक माना जाता है। उन्होंने कन्नड़ भाषा में उपलब्ध कुछ शुरूआती साहित्य की रचना भी की।

1000 वर्ष पूर्व
यह जानना महत्वपूर्ण है कि 1000 वर्ष पहले का क्या अर्थ है? यह वह वक्त था जब भारत की प्रांतीय भाषाएं तथा लिपियां उभर रही थीं, तब देश के जन-जीवन पर इस्लाम का प्रभाव नहीं पड़ा था, शंकराचार्य ने वेदांत पर अपना भाष्य लिखा था परंतु तब तक रामानुज या माधव नहीं हुए थे। तमिल अलवर और नयनार कविताएं लिखी जानी शुरू ही हुई थीं, भक्ति काल अभी उभर रहा था और अधिकतर दक्षिण भारत जैन व बौद्ध धर्म के सिद्धांतों से प्रभावित था।

बाहुबली की गाथा
उस वक्त बाहुबली की गाथा बहुत लोकप्रिय थी। उनकी गाथा हमें संस्कृत के साथ-साथ कन्नड़ भाषा में पढऩे को मिलती है।

जैन पौराणिक कथाओं में न विश्व की शुरूआत है न अंत। यह भाग्य (उत्सरपीनी) और दुर्भाग्य (अवसरपीनी) की धाराओं से गुजरती है। इनमें से प्रत्येक धारा में 24 महान संत (तीर्थंकर) तथा 12 महान राजा (चक्रवर्ती) हुए हैं। रिषभनाथ तत्कालीन धारा के प्रथम तीर्थंकर थे। वह महान राजा थे। उनके 100 पुत्र थे। भौतिक दुनिया को छोडऩे से पूर्व उन्होंने उन्हें 100 राज्य दिए थे। अपनी दो पुत्रियों ब्रह्मी तथा सुंदरी को उन्होंने लेखन तथा गणना की कला सौंपी।

उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत का विश्व पर राज करने वाला चक्रवर्ती बनना तय था। इसका अर्थ था कि उनके भ्राताओं को उनकी अधीनता स्वीकार करनी पड़ती। इसके बजाय वे अपने-अपने राज्य त्याग कर जैन संत बन गए। केवल एक भाई बाहुबली ने ऐसा नहीं किया। इस पर भरत ने बाहुबली के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। अनुचित रक्तपात को रोकने के लिए तय किया गया कि दोनों भाई द्वंद्व युद्ध करें और आपस में ही अपना झगड़ा निपटा लें।

इस द्वंद्व युद्ध में बाहुबली की विजय हुई। वह भरत को मुक्का जडऩे वाला था कि अचानक उसे एक पल के लिए आत्मबोध हुआ कि अपने बड़े भाई पर वह कैसे हाथ उठा सकता है? इसके बाद उसने भी अपने भाइयों की भांति संसार को त्याग कर संत बनने का निर्णय लिया परंतु इसका अर्थ था कि मठ में उसे अपने भाइयों के समक्ष झुकना पड़ता। वे सभी थे तो उम्र में उससे छोटे परंतु चूंकि वे उससे पहले संत बने चुके थे इसलिए पद में वे अब उससे वरिष्ठ संत थे। लेकिन वह तो किसी के समक्ष झुकना नहीं चाहता था और वह पूरे संसार का त्याग करना चाहता था परंतु जिस भूमि पर वह खड़ा था उसका त्याग कैसे करता क्योंकि वह तो अब भरत के नियंत्रण में थी।

बाहुबली ने भरत को मारने के लिए जो हाथ उठाया उससे अपना बाल उखाड़ कर दुनिया के समक्ष घोषित कर दिया कि उसने अपनी सत्ता और राज्य को त्याग दिया है। वह एक स्थान पर सीधा खड़ा हो गया और नेत्र बंद करके ध्यानमग्न हो गया। वह कम से कम भूमि पर खड़ा होने की कोशिश कर रहा था। उसके वस्त्र भी शरीर से गिर गए परंतु उसने नेत्र न खोले। हर कोई इस महान संत से आश्चर्यचकित था। सभी उसके सामने झुक गए, भरत तथा उसके अन्य सभी भ्राता भी। अंतत: उसकी बहनें आईं जिन्होंने महसूस किया कि ध्यानमनन तथा आत्मसंयम से बाहुबली को ज्ञान प्राप्त हो गया है परंतु वह सम्पूर्ण ज्ञान से अभी भी एक कदम दूर है। उन्होंने उससे कहा, ‘‘हाथी से उतर जाओ।’’

यह सुनते ही बाहुबली के समक्ष अंतिम अवरोध भी हट गया क्योंकि उसने जान लिया था कि उसका अहं ही उसे सम्पूर्ण ज्ञान तक पहुंचने नहीं दे रहा था। वही अहं जिसने उसे अपने भ्राता भरत के सामने झुकने से रोका, वही अहं जिसने उसे संत बन चुके छोटे भ्राताओं को प्रणाम करने से रोका, वही अहं जिसने किसी और की भूमि पर कदम रखने से उसे रोका। अपनी बहनों के निर्देशों का पालन करते ही बाहुबली सर्वाधिक श्रद्धेय जैन संतों में से एक हो गए।

बाहुबली की प्रतिमा में उनकी टांगों व बांहों से लिपटी लताएं उन बंधनों की प्रतीक हैं जो हमें इस धरती से बांधे रख कर ऊपर उठने नहीं देती हैं।

 

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