अद्वितीय जैन तीर्थ श्री अंतरिक्ष पार्श्वनाथ – शिरपूर

इस भव्य चमत्कारी प्रतिमा का इतिहास बहुत ही प्राचीन है| श्वेताम्बर मान्यतानुसार कहा जाता है, राजा रावण के बहनोई पाताल लंका के राजा खरदूषण के सेवक माली व् सुमाली ने पूजा निमित्त इस प्रतिमा का निर्माण बालू व् गोबर से किया था| जाते समय प्रतिमाजी को नजदीक के जलकुंड में विसर्जित किया था| शताब्दियो तक प्रतिमा जलकुंड में अदृश्य रही जो की विक्रम सं. ११४२ में चमत्कारिक घटनाओं के साथ पुन: प्रकट हुई| तत्पश्चात् श्री भावविजयजी गणि   के सदुपदेश  से मंदिर का जीर्णोद्धार   करवाकर उन्ही के सु हस्ते  विक्रम सं. १७१५ चैत्र शुक्ल ५ के दिन शुभ मुहूर्त  में प्रतिष्ठा पुन: संपन्न हुई|

राजसेवक माली और सुमाली असावधानी से पूजा के लिए प्रतिमा लाना भूल गए थे, इसलिए पूजा के निमित्त यहाँ पर इस स्थान से वापिस जाते समय नजदीक के जलकुण्ड में विसर्जित किया था| प्रतिमा शताब्दियो तक जलकुण्ड में अदृश्य रही| समयान्तर में इस कुण्ड के जल का उपयोग करने पर एलीचपुर के राजा श्रीपाल का कुष्टरोग निवारण हुआ| इस आशचर्यमयी घटना पर विचार विमग्न चिंतन करते समय राजरानी को स्वप्न में यह दृश्य दिखाई दिया  की इस जलकुण्ड में श्री पार्श्वप्रभु की प्राचीन व् चमत्कारिक प्रतिमा विराजमान करके खुद सारथी  बनकर मनचाहे वहा निशंक मन से ले जा सकता है| शंका करना नहीं व न पीछे मुड़कर देखना|

उक्त दुष्टान्त पर राजा द्वारा अन्वेषण करवाने पर प्रतिमा प्राप्त हुई| राजा ने प्रतिमाजी को विशाल जनसमूह के बीच धूमधाम के साथ वैसे ही वाहन पर रखकर उसे एलिचपुर ले जाने का उपक्रम किया, वाहन के साथ प्रतिमा चली| पर बीच में राजा के मन में शंका हुई की इतनी बड़ी प्रतिमा गाडी के साथ आती है या नहीं| इसलिए उसने शांत ह्रदय से पीछे मुड़कर देखा तो प्रतिमाजी उसी जगह पर एक पेड़ के नीचे आकाश में अधर में   स्थिर हो गई| कहा जाता है उस समय इस प्रतिमाजी के नीचे से घुड़सवार निकल जाय इतनी  अधरकी ऊंचाई थी|

राजा इस चमत्कारिक घटना से प्रभावित  हुआ|वही पर एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया व उस मंदिर में प्रभु को प्रतिष्ठित  करवाना चाहा| प्रतिष्ठा के समय राजा के मन में अहंकार आने  के कारण, लाख कोशिश करने पर भी प्रतिमा अपने स्थान से नहीं हिली| मंदिर सूना  का सूना  ही रहा| जो आज भी “पावली मंदिर” के नाम से प्रसिद्ध  है| जिस पेड़ के नीचे प्रतिमा स्थिर हुई थी वह भी मंदिर के नजदीक ही स्थित है| प्रतिष्ठा के  समय उपस्थित आचार्य श्री अभयदेवसूरीश्वर्

जी के उपदेश से श्री संघ ने गाँव के बीच एक दूसरा विशाल संघ मंदिर बनवाया और राजा  के सान्निध्य में संघ मंदिर में प्रतिष्ठा करवाने का निर्णय लेने पर प्रतिमाजी का संघ मंदिर में आगमन  हुआ और बड़े उत्साह व् मंगलध्वनि के साथ प्रतिष्ठा संपन्न हुई|

वि.सं. १७१५ में श्री भावविजयगनीजी को प्रभु दर्शन की अभिलाषा होने पर अंतरिक्षजी आए व भाव से प्रभु दर्शन करने पर आँखों की गई रोशनी फिर से आई, अंधापा दूर हुआ| उन्होंने यहाँ रहकर जीणोरद्वार करवाया व सं १७१५ चैत्र शुक्ल ५ को पुन: प्रतिष्ठा करवाई उस समय प्रतिमाजी जमीन से एक अंगुल प्रमाण अधर रही, जो अभी  भी यथावत  है| लेकिन वर्तमान में काल के प्रभाव से बाये किनारे पर  बिन्दुमात्र भाग का स्पर्श हुआ नजर आता है|

चमत्कार :

श्री भाव विजयजी गणी को आँख का भयंकर रोग लागू पड़ा था| विजयदेवसूरीजी की सूचना से उन्होंने पद्मावती मंत्र की आराधना की| पद्मावती देवी ने अंतरिक्ष पार्श्वनाथ प्रभु का इतिहास व महत्त्व समझाया|

पू. भावविजयजी गणी संघ सहित अंतरिक्षजी पधारे|

उन्होंने प्रभु की भावपूर्वक भक्ति की उस भक्ति के प्रभाव से उनका अंधत्व दूर हो गया| उनके नेत्रपटल खुल गए| यह रोमांचक घटना वि.सं १७१५ में बनी| इस मंदिर का पुन: जीर्णोद्धार  हुआ और १७१७ चैत्र सूद ५ का पुन: प्रतिष्ठा हुई|

इस स्थान के दर्शन  भाव सहित होने से अपनी मनोकामना पूरी कर सकते हैं .

      — डॉ अरविन्द जैन

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