चातुर्मास —आत्मावलोकन पर्व

बिना कारण के कोई कार्य उत्पन्न नहीं होता। कोई भी कार्य निर्थक नहीं होता। बहुत पहले समाज विखरित था। उस समय आवागमन के साधन शून्य। कच्चे मार्ग, बैलगाड़ी, घोड़ों की सवारी ही मुख्य साधन होते थे। अधिकतर निवास गांव में होते थे। व्यापार शुन्य ,खेती किसानी से निवृत्ति और आवागमन का साधन न होने से जीवन अवरुद्ध सा हो जाता। उस समय समय की उपयोगिता हेतु अधिकतर धार्मिक आयोजन किये जाते थे। जिससे समय के साथ जीवन की यथार्यता का दर्शन होते थे।हमें क्या करना चाहिए और हम क्या कर रहे हैं। इससे जीवन की दशा और दिशा समझ में आती थी और हैं भी।

कच्ची सड़के,हरियाली अधिक ,वर्षा की आधिक्यता से आवागमन सीमित होने से धार्मिक सामाजिक आयोजन किये जाते। जीव हिंसा का डर ,हरी साग सब्जी में रोगों का संक्रमण होने से उसका भी त्याग और उस समय इतनी प्रकार की सब्जियां भी नहीं मिलती थी तो सादा भोजन ,जीवन और उच्च विचार का परिपालन करते थे।

यह चातुर्मास सब समाज में और दर्शन में मनाते हैं और इसका आयोजन कुछ सार्थक उद्देश्य के होते थे और हैं। इसमें मुख्यतः जीव हिंसा का वचाब और धार्मिक भावना का उदघाटन करना ,इसके लिए कही भागवत गीता ,रामायण आदि का परायण होता हैं। आत्म कल्याण की भावना बलबती होती हैं।

जैन समाज में आज से पचास साठ पहले जैन आचार्यों ,मुनियों की इतनी अधिक संख्या नहीं रहती थी और न सब जगह मुनि वर्ग पहुंच पाते थे तथा उस समय आर्थिक संघर्ष भी आज की अपेक्षा अधिक था। उस समय आवागमन के साधन तैयार होने लगे थे। और समाज गांव से शहरों की ओर आने लगी चाहे व्यापार के लिए ,नौकरी के लिए या शिक्षा के लिए। या विकास के लिए।

पचास साठ साल पहले कुछ पंडित जी, कुछ विद्यवान ही पर्युषण पर्व में बुलाये जाते थे उसी समय धरम का रसास्वादन मिल जाता था। आचार्य श्री के प्रादुर्भाव से और उस समय अन्य आचार्यों के कारण अनेकानेक मुनि आचार्य, आर्यिकायें दीक्षित हुए और अब इस समय चातुर्मास स्थापना ने एक महोत्सव का रूप ले लिया, इतनी भव्यता होती हैं की भव्यता में भी प्रतिस्पर्धा होने लगी यह शुभ लक्षण हैं! इससे समाज में मुनि संघों ,आचार्य संघों ,आर्यिका संघो और ऐलक,क्षुल्लक ,ब्रह्मचारी आदि के माध्यम से ज्ञान की अमृत वर्षा होती हैं और प्रभावना का बोध होता हैं।

आजकल उच्च श्रेणी के श्रावक /श्राविका होते जा रहे हैं और वर्तमान में आचार्यों के कारण उनके शिष्य भी बेजोड़ ज्ञानी,ध्यानी ज्ञाता हो गए है। उन्होंने लगातार अध्ययन कर अपने आप में श्रेष्ठता हासिल की हैं। उनकी प्रभावना हमारे ऊपर अधिक क्यों पड़ती हैं? उसका कारण उनकी त्याग ,तपस्या। साधना, विवेक, ज्ञान और उनके द्वारा कुछ समाज, देश के कल्याण के हित की बात करते हैं। और वे मात्र स्व पर कल्याण में रत होते हुए समाज को बहुत देते हैं। संसार की अनित्य दशा से छूटकर आत्मिक कल्याण में लगो। आचार्य /मुनि /श्राविका समाज से आहार लेते हैं, जिसके कारण आहार दाता अपने को बड़ा भाग्यशाली मानता हैं, बड़े पुण्य से मुनि महाराज आदि आहार लेते हैं जिसके उत्साह का ठिकाना दाता को होता हैं और उसके बदले आचार्य /मुनि /आर्यिकाये स्वकल्याण /आत्मसाधना करती/करते हैं और समाज को ज्ञान दान, चरित्र निर्माण में सहयोग देती हैं, प्रेरणा देती हैं, प्रेरक बनते हैं।

आज कल साधन, सुविधाएं, व्यापार, नौकरी के कारण सम्पन्नता आने से समय की कमी होती जा रही हैं, हम कमवक़्त (कम वक़्त) होते जा रहे हैं, आज वर्तमान में आर्थिक, भौतिक चकाचौंध के कारण और बहुत सुशिक्षित होने के कारण विदेशों में जाना आजकल सामान्य होता जा रहा हैं और महानगरों में भी /व्यापार /नौकरी के कारण जाने से आहार/भोजन की परमपरा जो रात्रिकालीन त्याग की थी वह पूर्णतयः समाप्त हो गयी, और अब अंतरजातीय विवाह या प्रेम विवाह होने के कारन वे लोग समाज से जुड़ना नहीं चाहते। और धनवान लोग अपने अपने द्वीप में रहकर पूर्ण स्वच्छंदता से रहकर पर उपदेश देते हैं।

नगर निगम अशुद्ध पानी प्रदाय करती हैं पर हम अपना लोटे का पानी छान कर। साफ़ रखते हैं वैसे धरम व्यक्ति प्रधान होता हैं तथा भाव प्रधान हैं। भावना से ही बढ़ या छोटे होते हैं हम समाज सुधारक नहीं हैं। समाज का सुधारना बहुत कठिन हैं जब वह सम्पन्न ,शिक्षित हो और उसमे समाज का कोई नियंत्रण न हो ।कारण समाज इतना फैला हैं की कौन कहाँ क्या कर रहा है किसी को नहीं मालूम। पहले विजातीय शादी या नियम विरुद्ध कृत्य करते थे तो उन्हें समाज से बहिष्कृत किया जाता था, अब आजकल उन्हें ही श्रेष्ठि जन के  रूप में मान्यता मिलती हैं। आजकल अनैतिक ढंग से आय /आमदनी होने के कारण या करने के कारण जैसे शराब का धंधा करना ,स्मगलिंग करना ,सट्टा,जुआ खिलाना तस्करी करना या चमड़े उद्योग लगाना, कृमिनाशक रसायनों का व्यापार करना आज  समाज में सामान्य होता जा रहा हैं। और इन्ही के कारण बड़ी बड़ी योजनाओं में भागीदारी होती हैं। इससे उनके चरित्र का प्रभाव समाज पर नहीं पड़ता क्या  ? यह कोई व्यक्तिगत आलोचना नहीं है

हमारे लिए यह बहुत शुभ घडी हैं की इस समय चातुर्मास स्थापना इतनी जगह हो रहे हैं जिससे बहुसंख्य समाज मुनि, आचार्य आर्यिकाओं आदि की उपस्थिति से लाभान्वित होंगे और उन्हें भी साधना करने का अनुकूल स्थान मिलेंगे और हम लोग जो अज्ञानी, अबोध, धरम से दूर रहने वालों को जुड़ने और ज्ञान से वे भी अपना कल्याण कर सकेंगे। कल्याण न हो तो कोई बात नहीं सद मार्ग पर चलना सीख जाए यही सच्चा चातुर्मास होगा।

यह पर्व हैं अपने कल्याण का ,
यह अवसर हैं सुधारने और सुधरने का,
बीता हुआ समय नहीं आयेंगा
आगे को तो हम सम्हाल सकेंगे ।
 

— डॉक्टर अरविन्द जैन

 

 

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