शक्ति, साधुत्व और उदारवादी भावनाओं के प्रबल संवाहक हैं गोमटेश्वर

गोमटेश्वर बाहुबली की कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में  58 फुट ऊंची प्रतिमा बनी है। ये बाहुबली कोई और नहीं जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के पुत्र हैं। बाहुबली अपने बड़े भाई भरत चक्रवर्ती से युद्ध के बाद तपस्वी मुनि के रूप में जाने गए। बाहुबली ने करीब एक वर्ष तक कायोत्सर्ग मुद्रा में ध्यान किया। जिसके पश्चात् उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। गोमटेश्वर बाहुवली की  प्रतिमा आज भी उनके पराक्रम और अदभुत कौशल की कहानी कहती है। यह प्रतिमा प्राचीन काल में बनी थी।

कौन थे बाहुबली :

जैन मान्‍यता के अनुसार ऋषभदेव अयोध्या के इक्ष्वाकु वंश के राजा थे। राज दरबार में नीलांजना के नृत्य को देखकर संसार की असारता और जीवन को क्षणभंगुर देखकर  ऋषभदेव को वैराग्य उमड़ आया और वन में जाकर जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर ली। इस दौरान राज्य को उन्‍होंने भरत-बाहुबली समेत अपने सभी सौ पुत्रों में बांट दिया। आयोध्या का राज्य उनके पुत्र भरत को मिला जबकि छोटे भाई बाहुबली को  पोदनपुर का राजपद मिला। एक दिन भरत अपने दरबार में बैठे हुए थे तभी उन्‍हें सबसे पहले माली ने आकर बताया कि उनके पिता ऋषभदेव की साधना सफल हुई है। इसके बाद दूसरा शुभ समाचार मिला आयुधशाला से नौरत्नों के जरिए उन्हें चमत्कारी चक्र की प्राप्ति हुई है।  यह सुनकर और चक्ररत्‍न प्राप्‍त कर वह युद्ध पर निकल गए और छह खंडों को जीतकर वापस लौटे। इस दौरान भरत ने पूरी दुनिया को जीत लिया था बस उन्‍हें जीतने के लिए बाहुबली का राज्य पोदनपुर ही बचा था।

इसके लिए भरत ने बाहुबली को दासता स्वीकार करने के लिए पत्र भेजा लेकिन बाहुबली ने इनकार कर दिया। इसके बाद गुस्‍साए भरत ने एक बड़ी सी सेना लेकर छोटे से राज्‍य वाले बाहुबली के राज्‍य में आक्रमण कर लिया। लोग हैरान थे कि ऋषभदेव तो अंहिसा के पथिक हैं। ऐसे में उनके पुत्रों में युद्ध कैसे संभव है। इस पर तीन तरह के युद्ध की रणनीति तैयार हुई। जिसमें सबसे पहले दृष्टि युद्घ हुआ, उसके बाद जल युद्घ और मल्ल युद्घ हुआ। इन तीनों ही युद्धों में भरत को हार का सामना करना पड़ा। उन्‍हें यकीन नहीं था कि बाहुबली उन्‍हें हरा देगा। हालांकि भरत को जीतने के बाद बाहुबली ने वैराग्‍य लेने का निश्‍चय लिया। उन्‍हें लगा कि राज्‍य के मोह में ही ये भाईयों की लड़ाई हुई है। इसके बाद वह अपना राजपाट भरत को सौंप कर चले गए।

12 साल में तैयार हुई थी गोमटेश्वर की विशाल प्रतिमा :

जैन परंपरा के अनुरूप यह मूर्ति पूर्णतया दिगम्बर (नग्न) अवस्था में है और 30 किमी की दूरी से दिखाई देती है। मूर्ति के चेहरे के निर्मल भाव, घुंघराली आकर्षक जटाएं, आनुपातिक शारीरिक रचना, विशालकाय आकार और कलात्मकता तथा शिल्पकला के बेहतरीन मिश्रण के कारण इसे मध्यकालीन कर्नाटक की शिल्पकला की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि कहा जाता है। यह पूरे विश्व में एक पत्थर से निर्मित (एकाश्म) सबसे विशालकाय मूर्ति है।

इसके बाद गंग शासक के शासनकाल में चामुण्डराय नामक मंत्री ने बाहुबली की प्रतिमा बनवाई थी। यह प्रतिमा 12 साल में तैयार हुई थी।

जैन समुदाय का महाकुम्भ श्रवणबेलगोला में :

जैन समुदाय के महाकुम्भ गोमटेश्वर  बाहुबली महामस्तकाभिषेक का मुख्य आयोजन 17 से 26 फरवरी 2018 तक हो रहा है। हर 12 साल बाद हजारों श्रद्धालु महामस्तकाभिषेक के लिए यहां आते हैं। इस मौके पर हजारों साल पुरानी इस मूर्ति का दूध, दही, केसर, जल आदि से अभिषेक किया जाता है। पिछला अभिषेक फरवरी 2006 में हुआ था। मुख्य आयोजन के बाद भी 6 माह तक महामस्तकाभिषेक चलता रहता है।इस साल इसमें 50 लाख से अधिक श्रद्धालुओं के भाग लेने की संभावना है।

चामुंडराय ने कराया था मूर्ति का निर्माण :

कर्नाटक राज्य के श्रवणबेलगोला में विंध्यगिरि पहाड़ी की चोटी पर भगवान बाहुबली की एक मूर्ती स्थापित है. इसे गोमटेश्वर भी कहा जाता है. यहां तक पहुंचने के लिए 618 सीढियां चढ़कर आना पड़ता है. यह एक ही पत्थर से निर्मित विशालकाय मूर्ति है. इसका निर्माण 983 ई. में गंग राजा  के एक मंत्री चामुण्डराय ने करवाया था।  यह मूर्ति एक ही महीन सफ़ेद ग्रेनाईट पत्थर से काटकर बनाई गई है।

यह स्थल धार्मिक रूप से बेहद अहम माना जाता है। जैन  मान्यता के अनुसार  मोक्ष सबसे पहले बाहुबली भगवान को प्राप्त हुआ था। श्रवणबेलगोला के आसपास जैन बस्तियां हैं और उनके तीर्थंकरों की कई प्रतिमाएं भी।

बाहुबली को ‘गोमटेश्वर’ क्यों कहा जाता है? :-

चामुण्डराय का घर का नाम ‘गोम्मट’ था। उनके इस नाम के कारण ही उनके द्वारा स्थापित बाहुबली मूर्ति का गोम्मटेश्वर नाम पड़ा है अर्थात् गोम्मटेश्वर का अभिप्राय है चामुण्डराय के देवता । इसी कारण इस विंध्यगिरि को भी ‘गोम्मट’ कहते हैं। इसी गोम्मट उपनामधारी चामुण्डराय के लिये श्री नेमिचन्द्राचार्य ने अपने रचित जीवकांड, कर्मकाण्ड ग्रंथों को भी ‘गोम्मटसार’ नाम दे दिया है।

श्रवणबेलगोला में स्थित यह विशाल अलौकिक प्रतिमा शक्ति, साधुत्व, बल और उदारवादी भावनाओं की प्रबल संवाहक है ।
मैं अपने को परम सौभाग्यशाली मानती हूं जो मुझे गोमटेश्वर बाहुबली के महामस्तकाभिषेक 2018 के प्रसंग पर आयोजित राष्ट्रीय विद्वत सम्मेलन के दौरान इस महान दिव्य विशाल प्रतिमा का दर्शनलाभ प्राप्त हुआ।

-श्रीमती प्रियंका जैन ‘संचय’

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