जैन ग्रन्थ रत्नकरण्डक श्रावकाचार पठनीय और आदर्श

” रत्नकरण्डक श्रावकाचार “१५० श्लोकों का छोटा किन्तु महत्वपूर्ण ग्रन्थ हैं इसमें सम्यग दर्शन ,सम्यग ज्ञान और सम्यग चरित्र इन तीनों को धर्म कहकर उनका वर्णन किया गया हैं .इस ग्रन्थ में धर्म की निरुक्ति समझने लायक हैं –

देशयामि समीचीनं धर्म कर्मनिबहरंम !
संसारदुःखतः सत्त्वान यो धरतयुत्तमेसुख !!

स्वामी समंत्रभद्र स्वामी धर्म की निरुक्ति बताई हैं –“धरतीति धर्मः “जो धारण करावे –पहुंचावे उसे धर्म कहते हैं .संसार के प्राणी नरकादि चारों गतियों में जन्ममरण करते हुए शारीरिक ,मानसिक और आगंतुक दुखों से दुखी हो रहे हैं .धर्म उन्हें संसार के उपर्युक्त दुखों से निकलकर उत्तम सुख में पहुंचा देते हैं .उत्तम सुख यानी मोक्ष सुख से हैं क्योकि मोक्ष प्राप्त होने पर ही यह जीव जन्ममरण के दुखों से बच सकता हैं .मोक्ष प्राप्तिके अभाव में स्वर्गादि के सुख भी आपेक्षिक सुख कहा जाता हैं परन्तु ज्ञानी जीवों का लक्ष्य उस ओर नहीं जाता हैं.उनका लक्ष्य तोएक सुख की ओर रहता हैं परन्तु उसके अभाव में स्वर्गादिक का सुख स्वयं प्राप्त हो जाता हैं .जैसे किसान खेतितो अन्नप्राप्ति के उद्देश्य से ही करता हैं परन्तु अन्नप्राप्ति के अभाव में पलाल स्वयं मिल जाता हैं ,वह सिर्फ पलालप्राप्ति के उद्देश्य से खेती तो नहीं करता हैं .

मानव जीवन में अहिंसा एवं शाकाहार का विशेष महत्व है। अहिंसा एक श्रावक के लिये अणुव्रत धर्म है बहीं दूसरी ओर मुनियों के लिये महाव्रत है। मनुष्य दैनिक जीवन चर्या में सूक्ष्म हिंसा का भागीदार हो ही जाता है लेकिन साधू की चर्या अहिंसात्मक है। जैन आचार्यों, मुनियों तथा कुछ श्रावकों में ही पुर्ण आचरण की शुद्धिता पायी जाती है, जिनकी करनी तथा कथनी एक होती है। यदि हमें चारित्रिक विकास करना है तो निश्चित रूप से, मन वचन काय से एकरूपता लानी होगी।
अहिंसाणुव्रत :

संकल्पात्कृतकारित मनना उद्योगत्रयस्य चरसत्तावान !
न हिनस्ति यत्तदाहुः स्थूलवधाद्विरमणं निपुणाः !!

रत्नकरण्डक श्रावकाचार में आचार्य समंतभद्र स्वामी ने अहिंसाणुव्रत के बारे में लिखा है कि मन से, वचन से तथा काय से जानबूझकर हिंसा न तो करना, न करवाना और न किये जाने का अनुमोदन/ समर्थन करना अहिंसाणुव्रत का परिपालन है। अंग छेदन, बंधन, पीड़न, अधिक भार लादना तथा आहार को रोकना ये पांच अहिंसाणुव्रत के अतिचार हैं। अहिंसा जैन धर्म का आधार स्तम्भ है। जैन धर्म में प्राणी मात्र के कल्याण की भावना निहित है। जैन धर्म में मनुष्य, पशु-पक्षी, कीड़े–मकोड़े के अलावा पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति में भी जीव माना गया है। जैन धर्म के अनुसार इन जीवों को न मारना ही अहिंसा है।

जैन दार्शिनिकों ने उस क्रिया को हिंसा कहा है जो प्रमाद अथवा कषायपूर्वक होती है। हिंसा दो प्रकार की होती है : भाव हिंसा और द्रव्य हिंसा।

भाव हिंसा का सम्बंध कषाय से है। द्रव्य हिंसा भाव हिंसा से उत्पन्न होती है और भाव हिंसा को उत्पन्न भी करती है। एक व्यक्ति ऐसा है जो केवल वध की भावना करता है; दूसरा भावना के साथ वध करता है; और तीसरा व्यक्ति बिना भावना के ही वध कर देता है, अत: इन तीनों ही हिंसा में असमानता है।

जो हिंसा भावरूप भी है और द्रव्यरूप भी, ऐसी हिंसा को हम पूर्ण हिंसा कहेंगे। 2. जो हिंसा केवल भावरूप है, ऐसी हिंसा किसी अंश में अपूर्ण होती है।इसे अपूर्ण अहिंसा भी कह सकते हैं। 3. जो हिंसा केवल द्रव्यरूप है, ऐसी हिंसा को अपूर्ण अहिंसा अथवा अपूर्ण हिंसा कहा जा सकता है। इसमें केवल प्राणवध होता है। ४ जहां न भावरूप हिंसा हैन द्रव्यरूप हिंसा, ऐसी स्थति का नाम पूर्ण अहिंसा है। इसमें न प्रमत्त प्रवृत्ति होती है न प्राण वध॥

खान पान का असर हमारे जीवन और व्यवहार पर बहुत ज्यादा पड़ता है। मनुष्य स्वाभाविक रूप से एक शाकाहारी प्राणी है लेकिन आधुनिक जीवन शैली ने उसे सर्वहारी बना दिया है। अत: आत्म चिंतन तथा स्व मूल्यांकन की आवश्यकता है इससे अनेक समस्याओं का स्वत: समाधान हो जायेगा। अत: हम अंधी प्रतिस्पर्धात्मक दौड़ में ना भागें बल्कि स्वविवेक पूर्वक कार्य करें। कहा भी गया है कि : जैसा खाओगे अन्न, वैसा होगा मन।

अहिंसा को आचरणीय कहा गया है क्योंकि संसार के सभी प्राणी जीना चाहते हैं, कोई भी प्राणी मरना नहीं चाहता। जिस प्रकार सभी को सुख प्रिय है और दुख प्रिय नहीं है इसलिये किसी को भी हिंसा नहीं करनी चाहिये। सभी धर्मों में अहिंसा का महत्व बताया गया है लेकिन फिर भी सारे विश्व में धर्म के नाम पर ही दंगा, फसाद और हिंसक गतिविधियां होती हैं। इसके पीछे का प्रमुख कारण धार्मिक कट्टरता, धार्मिक उन्माद, सहिष्णुता तथा भाईचारे की कमी है। अत: धार्मिक सहिष्णुता एवं वार्तालाप के द्वारा शांति और सद्भाव का वातावरण बनाने का प्रयास करना चाहिये। जैन धर्म की दृष्टि से हिंसा एक कषाय है जो कषाय से उत्पन्न होती है और कषाय को उत्पन्न भी करती है। जबकि अहिंसा न तो कषाय का कारण है न कषाय का कार्य। अत: अहिंसा आचरणीय है।

जैन धर्म के सिद्धांत : अनेकांतवाद तथा स्यादवाद हमें सर्व धर्म समभाव की सीख देते हैं बहीं भगवान महावीर का सिद्धांत “जिओ और जीने दो” सब जीवों के कल्याण की राह दिखाता है। बहीं “परस्परोपग्रहो जीवानाम” का सिद्धांत सभी जीवों पर उपकार करते हुये, भलाई का कार्य करते हुये जीवन जीने की प्रेरणा देता है। अंत में कहना चाहता हूं कि आज विश्व को भगवान महावीर के सिद्धांतों को अपनाने की आवश्यकता है क्योंकि विश्व कल्याण के लिये, विश्व शांति के लिये अहिंसा ही एक मात्र समाधान है। अहिंसा परमो धर्म की जय।

मनुष्य को जीवन में जागरूक रहते हुये सात्विकता पूर्ण आचरण करना चाहिये। इसके अलावा खान पान में पूर्ण शाकाहार का पालन करना चाहिये। इस तरह से जीवन में श्रेष्ठता तथा सम्पन्नता आयेगी। प्रकृति का संरक्षण होगा। यह सभी जीवों के हित में है इसमें किसी का भी अहित नहीं है इसीलिये यह एक आधुनिक श्रेष्ठ जीवन शैली है। इसे अपनाकर मानव अपनी श्रेष्ठता सावित कर सकता है।
इसी प्रकार जैन धर्म का मूल आधार अहिंसा के कारण मद्य, मांस ,मधु को वर्जनीय माना हैं —

त्रसहतिपरिहरनॉर्थर्न क्षौद्रं पिशितं प्रमाद परिहरताये !
मद्यं च वर्जनीयम जिनचरणौ शरणमुपायते !!

जैनधर्म धारण करने का प्रारम्भिक नियमहैं मद्य मांस और मधु का त्याग किया जावे .इसकेबिना जैन धर्म का धारण नहीं हो सकता .क्षुद्रा मधुमक्षिका को कहते हैं .अतः”क्षुद्राभिः निवर्त्तम “इस व्युत्पत्ति से मक्षिकाओं द्वारा रचा हुआ पदार्थ क्षौद्र या मधु कहलाता हैं .इसमें अनंत त्रस जीव उतपन्न होते हैं .और पोषित –मांस द्वीन्द्रियादिक जीवों का कलेवर हैं .इसकी भी कच्ची और पक्कीडोनों अवस्थाओं में अनंत त्रसजीव उतपन्न होते हैं .एंकर सेवन से उन जीवों का घात होता हैं .इसी प्रकार मद्यभी त्रस हिंसा का कारण हैं .साथ ही उसके सेवनसे हिताहित का विवेक भी नष्ट हो जाता हैं .अतः यह श्रावक के द्वारा जीवन पर्यन्त के लिए छोड़न योग्यहैं .

रत्नकरण्डक ग्रन्थ में आगम का ज्ञाता तप करता हुआ ऐसा मानता हैं की वही श्रेष्ठ ज्ञाता होता हैं अर्थात आगम को जाने वाला श्रावक यदि निश्चय रखता हैं की पाप अर्थात अधर्म –मिथ्यादर्शन ,मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र रूप परिणति ही अनेक अपकार का कारण होने से इस जीव का शत्रु हैं और धर्म सम्यग दर्शन ,सम्यग्ज्ञान और सम्यग्चारित्र रूप परिणति ही अनेक उपकार का कारण होने से मित्र हैं तो वह श्रेष्ठ ज्ञाता होता हैं अथवा कल्याण का ज्ञाता होता हैं .
इस प्रकार यह ग्रन्थ श्रावक श्राविकाओं के साथ सभी के आत्म उत्थान के लिए अत्यंत लाभकारी हैं

डॉक्टर अरविन्द जैन (Jain24)

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