श्रमण संस्कृति के अनमोल संत थे तपस्वी मुनि श्री चिन्मय सागर जी

संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज के परम प्रभावक शिष्य  मुनि श्री चिन्मय सागर जी की संलेखना समाधि 18 अक्टूबर 2019 को  06:18 मिनिट पर  कर्नाटक में हो गयी है।

आज 18 अक्तूबर को  मुनिश्री का 7 वाँ दिन था..!! और आप सुबह रोज की तरह डाक्टर की टीम जाँच करने आयी तो डाक्टर ने मशीन लगाकर जाँच कर “कन्नड़ भाषा के शब्दों” में कहा कि  महाराज की “समाधि” हो चुकी है तो महाराज जी ने सुन लिया, आँख खोल कर स्वयं  डाक्टर का हाथ पकड़कर अपने सीने पर रखवाया व कहा कि चेक करो मैं जाग्रत हु डाक्टर चकित रह गये, फिर डॉ ने चैक किया तो न तो पल्स आ रहे हैं, न ही नाडी देखने से पता चला कि नाडी में भी कोई धड़कन नहीं है..!

आचार्य श्री विद्या सागर जी महाराज द्वारा वीर सेवादल के प्रथम दीक्षित मुनि । महान पारखी आचार्य श्री विद्या सागरजी महाराज से ब्रह्मचर्य से सीधी मुनि दीक्षा, सदा साध्य से साधने की भावना रखने वाला साधक भीषण गर्मी,कडकडाती ठण्ड, मुसलाधार वर्षा आदि में जंगल में रह सकता है और बाधा उपसर्ग, परिषह सहन कर सकता है ।

जंगल वाले बाबा के नाम से प्रसिद्ध, जंगल में चातुर्मास करके जंगल में भी मंगल कर देते थे।

जीयो और जीने दो को जिन्होंने जीवन में उतार लिया है वे ही जंगल की साधना कर सकते है लगता है जिस तरह भगवान् महावीर जीयो और जीने दो की साधना के लिए ही साधक बनकर जंगल गए थे। उसी तरह मुनिश्री भी भगवान् महावीर का अनुकरण- अनुसरण करते हुए जंगल की साधना कर रहे थे ।

आप अस्वस्थ होकर भी साधना निरंतर करते रहे ,सबके संघर्ष ,उत्कर्ष और साधना में सहयोग देना ही आपका जीवन बन गया है। आपका एक फेफड़ा (Lungs) समाप्त हो जाने पर भी आपका स्वस्थ्य एवं शरीर इतना क्षीण हो जाना कि सोने उठने पर भी तकलीफ होना। ऐसे समय भी हजारों कि. मी. का विहार करना,आदेश का पालन करना और अपने मुनि व्रत में कोई दोष न आने देना अपने आप में बहुत बड़ा उदाहरण है। यह सब देख कर विश्वास हो गया कि साधना केलिए शारीरिक शक्ति ही नहीं बल्कि अपने अंदरकी शक्ति की भी आवश्यकता होती है।

आप द्रढ इच्छा शक्ति के धारी संत थे। संसार में आपके लिए कुछ भी असाध्य एवं असंभव नहीं है, आप द्रढ संकल्पि भी है, सहिष्णु वन समताधर शत्रु का भी कल्याण करने में कोई कसर नहीं छोड़ा, आपके लिए समय कम पड़ता है, जीवन छोटा लगता था। आप बहुत कम समय में बड़े बड़े काम करने के लिए की क्षमता रखते थे, द्रढ संकल्पी मुनिश्री कठिन से कठिन कार्य का यदि संकल्प ले लेते हैं तो उनका मनोबल मेरु के सामान ऊँचा हो जाता है वह कार्य सहज और सरल दिखाई देने लगता है। आपने २४ दिन के अन्दर ३ पंचकल्याणक और गजरथ मोहत्सव करवाकर इतिहास बना दिया था।

पूज्य मुनिश्री की प्ररेणा से हजारों-लाखों लोगों ने शाकाहार को अपनाया, जुआ, मांस, मदिरा का त्याग किया। जिससे उनके जीवन को एक नई दिशा मिली। न केवल जैन समुदाय बल्कि हजारों जैनेतर बंधु उनके भक्त थे।उनके पास जो भी आता था उन्हें वह व्यसन मुक्त जीवन जीने की प्रेरणा देते थे। उनके उपदेश से प्रभावित हो हजारों लोगों ने व्यसन त्याग किया और एक नया जीवन प्राप्त किया।

संक्षिप्त परिचय

आपका जन्म ०६-०८-१९६१ को हुआ था। आपका जन्म  नाम श्री धर्नेन्द्र कुमार जी जैन था। जन्म स्थान जुगुल जिला बेलगाँव (कर्नाटक) और माता का नाम श्रीमती हीरादेवी मोले पिता का नाम श्री अन्नपा मोले जी शिक्षा हायर सेकंड्री थी। ब्रह्मचर्य व्रत सन १९८२ में और संघ प्रवेश ९ जुलाई १९८७, अतिशय क्षेत्र थुवोन जी में मुनि दीक्षा,  दीक्षा गुरू संत शिरोमणी आचार्य श्री विद्यासागर जी थे। आप जंगल में रहकर चतुर्थ कालीन मुनि की तरह चर्या-तपस्या के लिए जाने जाते थे।

संत शिरोमणि प. पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महामुनिराज के परम प्रभावक शिष्य पूज्य मुनि श्री 108 चिन्मय सागर जी मुनिराज (जंगल वाले बाबा) का समतापूर्ण समाधिमरण आज सांय 06:26 बजे जुगुल में हुआ। यह खबर आग की तरह पूरे देश में फैल गयी । पारस चेनल पर लाइव प्रसारण किया गया।

अब हमारे बीच पूज्य मुनिश्री नहीं लेकिन उनके सद उपदेश सदैव जीवंत रहेंगे। परम् पूज्य मुनि श्री 108 चिन्मय सागर जी मुनिराज के चरणों मे शत-शत नमन एवं भावपूर्ण श्रद्धांजलि।

 

— डॉ. सुनील जैन संचय

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