भगवान महावीर के उपदेश और दैनिक जीवन के प्रसंग

एक दिन जब भगवान महावीर मगध (बिहार) में ऋजुकूला नदी के किनारे साल वृक्ष के नीचे तपस्या रत थे, उनको कैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ। वे अरिहंत, जिन और वीतराग हो गए। जिसे कैवल्य ज्ञान प्राप्त हो जाए, वह तीनों लोकों और तीनों कालों को एक साथ जानता है। इसके लिए महावीर ने ऋजुकूला के तट पर तीन वर्ष, पांच मास और पंद्रह दिवस तक घोर तपस्या की थी।

अरिहंत भगवान महावीर अपने उपदेश अत्यंत साधारण भाषा में देते थे। वह इतना सहज होता था कि उसे प्रत्येक जन अपनी भाषा में ग्रहण कर लेता था। कहते हैं कि जहां भी उनका उपदेश होता था, वहां कुबेर स्वयं सभागृह का निर्माण कराता था। संभवत: इसका आशय यह रहा हो कि अरिहंत के उपदेश इतने लोकप्रिय होते थे कि लोग उत्साहपूर्वक पहले ही वहां सभा भवन बना लेते थे।

उन्होंने अपने समय में इस संसार में व्याप्त हिंसा का वातावरण, स्त्रियों की हीन दशा और असहाय लोगों की वेदना देखी। ऐसे वातावरण में उन्होंने निश्चय किया कि वे सन्मार्ग प्राप्त करेंगे और विषय भोग, हिंसा, परिग्रह और असत्य में गोता लगा रहे संसारी जनों का उद्धार करेंगे।

महावीर ने अनेक स्थानों जैसे कुरु, मगध, कामरूप, अंग, बंग, विदर्भ और गौड़ इत्यादि में विहार किया और लोगों को अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह की शिक्षा दी। वे कहते थे कि हिंसा केवल मारना नहीं हैं, बल्कि कठोर वचन बोलना, मन- वचन- काया को संयम में न रखना और मार्ग में देख कर न चलना भी हिंसा को बढ़ावा देते हैं।

उन्होंने कहा कि चोरी के माल को खरीदना, झूठे साक्ष्य तैयार करना और कर चोरी करना आदि मनुष्य के आत्म विकास के शत्रु हैं। इस तरह वे दैनिक जीवन के छोटे-छोटे उदाहरणों के माध्यम से लोगों को शिक्षित करते थे। उनके ऐसे उपदेशों से ही प्रभावित होकर लोगों ने पशु बलि बंद कर दी और सदाचार का जीवन व्यतीत करने लगे।

उन्होंने नारियों के प्रति असमानता, अत्याचार और उत्पीड़न का घोर विरोध किया। इस सामाजिक दोष को दूर करने के लिए उन्होंने स्त्रियों को अपने संघ में स्थान दिया। उनके संघ में श्रमण, श्रमणी, श्रावक और श्राविका सभी समान अधिकार से रहते थे। उन्होंने जातिवाद का भी घोर विरोध किया और कहा कि कर्म से ही मनुष्य छोटा या बड़ा बनता है। जन्म से सभी एक समान पैदा होते हैं, किंतु कर्म से मनुष्य ब्राह्मण या विद्वान बनता है।

वे कहते थे कि संसार में लोक कल्याण, विश्वशांति, सद्भाव और समभाव के लिए अपरिग्रह का भाव जरूरी है।यही अहिंसा का मूलआधार है।परिग्रह की प्रवृत्ति अपने मन को अशांत बनाती है और हर प्रकार से दूसरों की शांति भंग करती है।लेकिन आज बड़ा राष्ट्र छोटे राष्ट्र को हड़पना चाहता है और धनवान व्यक्ति परिग्रह के द्वारा असहायों के लिए समस्याएं पैदा करता है। वह संसाधनों पर कब्जा कर लेता है।इससे मानसिक क्रोध बढ़ता है और हिंसा को बढ़ावा मिलता है।

महावीर कहते थे कि संसार में आत्म कल्याण के लिए एक – दूसरे का सहयोग परम आवश्यक है।कोई भी प्राणी अकेला नहीं चल सकता, उसको दूसरे की सहायता अवश्य चाहिए । इसलिए सदा एक-दूसरे के सहायक बनें। इसी तरह बड़ा राष्ट्र छोटे राष्ट्र का सहायक बने, समर्थ असमर्थ का पोषक बने।
आज की दुनिया के कुबेर कंप्यूटर जगत के बादशाह बिलगेट्स हैं। हालांकि वे व्यवसायी हैं, पर वास्तव में अपरिग्रहवादी हैं। उन्होंने गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा और बीमारी को दूर करने के लिए अपना खजाना खोल रखा है। यदि हम भी महावीर के बताए मार्ग पर चलें, तो एक शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत कर सकेंगे।

जन्म- मरण एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। जन्म के बाद मरण निश्चित है। भगवान महावीर ने 72 वर्ष की आयु में 527 ईस्वी पूर्व पावापुरी में निर्वाण प्राप्त किया।

– रवि कुमार जैन (पावापुरी)

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