पांडवों ने बदल लिया था धर्म, आखिर क्या है सच्चाई..

जैन धर्म मानता है कि पांडव क्षत्रिय तो थे लेकिन जैन छत्रिय. जैन मुनी करते हैं इसकी पुष्टि

जब आप जैन तीर्थस्थल हस्तिनापुर जाते हैं तो वहां के जैन मंदिर में लगी एक बड़ी पेंटिंग ये दिखाती है कि पांचों पांडव भाइयों के साथ द्रोपदी जैन धर्म की दीक्षा ले रहे हैं। इसका मतलब तो यही हुआ कि पांडव ने जीवन के आखिरी बरसों में अपना धर्म बदल लिया था।

क्या कहती है मंदिर में लगी पेंटिंग
पांडवों के जैन धर्म में आ जाने की पेंटिंग हस्तिनापुर के श्री दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में लंबे समय से लगी हुई है। अक्सर पर्यटकों को जैन मंदिर में पांडवों की ये पेंटिंग देखकर हैरानी भी होती है। लेकिन ज्यादातर इस पर कोई गौर नहीं करते। इस पेंटिंग के बारे में जब इस मंदिर के पुजारियों से बात की गई तो उनका यही कहना था कि ये पेंटिंग एकदम ठीक है। ये सच्चाई है कि पांडवों ने अपनी पत्नी द्रोपदी समेत जैन धर्म स्वीकार कर लिया था।

पांडव को तो हिंदू क्षत्रिय माना जाता है
आमतौर पर यही माना जाता है कि पांडव हिन्दू धर्म से ताल्लुक रखने वाले क्षत्रिय थे। जिन्होंने हस्तिनापुर में शासन किया। बाद में उन्हें चौपड़ के खेल में कौरवों के हाथों अपना राजपाट गंवाना पड़ा। साथ ही 14 साल का निर्वासन भोगना पड़ा। जब वो लौटे तो कौरव उनका राज लौटाने के पक्ष में नहीं थे। लिहाजा महाभारत का युद्ध लड़ा गया। इसी युद्ध में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिए, वो गीता के रूप में हिन्दुओं का सबसे पवित्रतम ग्रंथ बन गया। अब भी यही माना जाता है कि जीवनभर पांडव हिन्दू रहे।

जाने-माने जैन मुनि भी लगाते हैं मुहर

दिल्ली के जाने माने और सम्मानीय जैन मुनि से जब हस्तिनापुर में पांडवों को जैन धर्म स्वीकार करने के संबंध में बात की गई तो उन्होंने कहा कि पांडवों ने हिन्दू धर्म को छोड़कर जैन धर्म स्वीकार नहीं किया था बल्कि वो जन्म से ही जैनिज्म से ताल्लुक रखते थे। वो मूल रूप से जैन ही थे। बेेशक पांडव क्षत्रिय थे लेकिन उन्हें जैन क्षत्रिय कहा जाना चाहिए। उनका कहना है कि महाभारत काल में जैन धर्म के 22वें तीर्थांकर मौजूद थे।

कृष्ण के रिश्ते के भाई थे 22वें तीर्थांकर

जैन धर्मशास्त्रों के अनुसार 22वें तीर्थांकर का नाम नेमी था, जो रिश्ते में कृष्ण के भाई थे। जैन वर्ल्ड डॉट कॉम साइट कहती है कि बलराम और कृष्ण जैन ही थे। हालांकि ये साइट कहती है कि कौरव और पांडव बाद में जैन धर्म में चले गए थे। आखिरी बरसों में वो तपस्वी बन गए। बाद में निर्वाण को प्राप्त हुए।

साभार: संजय श्रीवास्तव, मेरठ, Patrika.com

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