जीवन का अंतिम लक्ष्य है सल्लेखना – मुनि श्री विशोक सागर जी

खनियाधाना । नगर मे मुनि श्री विशोक सागर महाराज एवं मुनि श्री  विधेय सागर जी महाराज का वर्षाकालीन चतुर्मास चल रहा है । पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन बडा मन्दिर जी मे मुनि श्री द्वारा ज्ञान की धारा निरनतन बहाई जा रही है । मुनि श्री विशोक सागर जी महाराज जी ने प्रवचन श्रिरंखला मे आज  जिस समय योगीजन, अपनी योग साधना में संलग्न होते है उस समय उनका लक्ष्य एक मात्र समाधि का होता है। जैसे भण्डागार में आग लग जाने पर बहुत उपकारी वस्तु को आग से सुरक्षित किया जाता है उसी प्रकार व्रत और षील से समृद्ध मुनि के तप करते हुए किसी कारण से विध्न के उत्पन्न होने पर उनका संधारण करना, शांत करना समाधि है। मन को षुभोपयोग या शुद्धोपयोग में एकाग्र करना वह समाधि है।

उत्तम परिणामों में चित्त का स्थिर रखना अथवा पंच परमेष्ठियों के स्मरण को समाधि कहते है। शुक्लध्यानरूढ़ अवस्था भी समाधि है अर्थात् अध्यात्म ग्रंथो में ध्यान को ही समाधि संबा दी जाती है। जिस तरह मुख्य की शोभा ललाट से होती है, ललाट की शोभा तिलक से होती है, राजा की शोभा मुकुट व सिंहासन से होती है, मंदिर की षोभा षिखर से होती है षिखर की षोभा कलष से हाती है उसी प्रकार साधना की शोभा समाधि से होती है। समाधि वह फल है जिस फल को पाने के लिए संतजन निरंतर जीवन भर साधना की यात्रा करते है। समाधि वह मंजिल है जिसे पाने के लिए त्याग और तपस्या की कितनी सारी सीढ़िया चढ़नी पड़ती है। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र में अवस्थान होने का नाम समाधि है।

जिस समय योगीजन, अपनी योग साधना में संलग्न होते है उस समय उनका लक्ष्य एक मात्र समाधि का होता है। जो यति एक बार भी समाधि पूर्वक मरण को प्राप्त कर लेता है वह अनेक भव संसार में भ्रमण नही करता अपितु अधिक से अधिक 8 भावों में नियम से मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। बाल पंडित मरण करने वाला श्रावक उत्कृष्टता से 7 भवों में नियम से सिद्ध होता है। दर्शन, ज्ञान, चरित्र व तप रूप चार आराधना करने वाला उत्कृष्ट से 7 वें भव तथा जघन्य से तीसरे भव में मुक्ति को पा लेता है।

मात्र मृत्यु का नाम समाधि नही, अपितु पूर्ण विवेक के साथ संयम धर्म की रक्षा हेतु प्राणों का काय व कषाय को कृष करते हुए छोड़ना समाधि है। समाधि में साधक को संक्लेष्ता नही आनंद होता है। हे परमात्मा। वह दिन, वह घड़ी, वह क्षण कब आ जाए कि मैं साधु बनकर निर्विकल्प दशा में तल्लीन रहूँ इस भावना को भाने का नाम ही साधु समाधि है। जब संतजन शुद्धोपयोग में तल्लीन होते है तब वे सातवें आदि उपरिम गुणस्थानों को प्राप्त करते है तब वे अभेद रलत्रय या निर्विकल्प समाधि में स्थिर कहे जाते है।

जो मृत्यु के विषय में सोचता है तो संसार की क्षणभंगुरता का ज्ञान होता है और कदम पापों से हटकर पुण्य कार्य की ओर बढ़ने लगते हैं। प्रति समय इस प्राणी की मृत्यु हो रही है मृत्यु हो रही है षास्त्रों में इसे अवीचि मरण कहते है। ज्ञानी सोचता है धीर भी मरता है अधीर भी मरण को प्राप्त करता है। वीर भी मरता है तथा डरपोक भी मरता है जब मरण होना सुनिक्षित है तो क्यों न वीर मरण करूँ।

मृत्यु को ‘महोत्सव‘ बना दूँ ऐसे परिणामों को या भावना को भाना साधु समाधि भावना है। साधु समाधि भावना को भाने वाला एक दिन तीर्थकर पद प्राप्त कर पंडित-पंडित मरण को प्राप्त करता है। जीवन का अंतिम लक्ष्य है- सल्लेखना। साधक की साधना का चमोत्कर्ष है-सल्लेखना। साधक की सम्पूर्ण साधना का निचोड़ है-सल्लेखना। जीवन का अंतिम सोपान है-सल्लेखना। सल्लेखना पूर्वक मरण करना कोई आत्मघात या आत्महत्या नही, यह तो जीवन के पवित्र बनाने की कला है।

जीवन को जीवित एवं मृत्यु को जीतने की अनोखी प्रक्रिया है-सल्लेखना। सल्लेखना का अर्थ सत्- लेखना अर्थात् सम्यक् या समीचीन रीति से षरीर और कषायों का लेखन अर्थात् कृष करना। सल्लेखना का अभ्यास प्रारंभ से इसलिए आवष्यक होता है ताकि साधक मृत्यु की बेला में सावधान रहे। सल्लेखना का पूर्व से अभ्यास नही किया तो एसे मृत्यु के अंतिम क्षण में घर- परिवार आदि नजर आने लगते है।

 

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