आज दशलक्षण धर्म का पाँचवा दिन है- उत्तम सत्य धर्मांग

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आज उत्तम सत्य धर्म का दिन है। जहाँ क्षमा , मार्दव , आर्जव , शौच आत्मा का स्वभाव है , वहीं सत्य संयम तप त्याग इन गुणों को प्रगट करने के उपाय हैं , या कहें कि ये वो साधन हैं जिनसे हम आत्मिक गुणों की अनुभूति और प्रकट कर सकते हैं।

जैन दर्शन में सत्य का अर्थ मात्र ज्यों का त्यों बोलने का नाम सत्य नहीं है , बल्कि हित-मित-प्रिय वचन बोलने से है। हितकारी वचन यानि जिसमें जीव मात्र की भलाई हो , कहने का अभिप्राय ये है कि जिन वचनों से यदि किसी जीव का अहित होता हो तो वे वचन सत्य होते हुये भी असत्य ही है। मित यानि मीठा बोलो अर्थात् कड़वे वचन , तीखे वचन , व्यंग्य परक वचन , परनिंदा , पीड़ाकारक वचन सत्य होते हुये भी असत्य ही माने गये हैं। प्रिय वचन यानि जो सुनने में भी अच्छे लगे , ऐसे वचन ही सत्य वचन हैं।

   “अनगार धर्मामृत”  के अनुसार —

जो वचन प्रशस्त , कल्याणकारक , तथा सुनने वाले को आह्लाद उत्पन्न करने वाले , उपकारी हों ऐसे वचनों को ही सत्यव्रतियों ने सत्य कहा है। किन्तु उस सत्य को सत्य न समझना जो अप्रिय और अहितकर हो।

जिन वचनों से जीवों की विराधना हो, हिंसा संभव हो ऐसे वचन सत्य होते हुये भी असत्य ही हैं, कभी नहीं बोलना चाहिये। जैसे राजा वसु सत्यधर्म का धारक होने से सर्वत्र धर्म के राजा के रूप में प्रतिष्ठित था , पर फिर किसी कारणवश ही सही , झूठ बोलते ही नरक गति का पात्र बना , और वहीं दूसरी और नारद सत्य बोलने से स्वर्ग का पात्र बना। “कविवर द्यानतराय” जी के शब्दों में —

 

इसलिये कहते हैं बोलने से पहले विचार अवश्य करना चाहिये , यदि वसु राजा झूठ बोलने से पहले एक बार विचार करता तो आज वह जीव नरक में नहीं होता। लोक में कहावत चलती है —

ऊँचे सिंहासन बैठि वसु नृप ,
धरम का भूपति भया।
वच झूठ सेती नरक पहुँचा ,
सुरग में नारद गया।।

बोलना एक सुंदर कला है परन्तु मौन रहना उससे भी श्रेष्ठ।

भाई ! ऐसे सत्य वचनों को समझे बिना जीव का कल्याण संभव नहीं है। सत्यवादी की ही सर्वत्र प्रतिष्ठा होती है , वही सुखी है। नम्रता और प्रिय संभाषण ही मनुष्य के आभूषण माने गये हैं। वर्ना आँख , नाक, कान तो जानवरों के भी होते हैं , खाना पानी, काम-भोगादि तो पुण्य की अनुकूलता से जानवरों को भी प्राप्त हो जाते हैं , एक वाणी ही अनमोल है जो तिर्यंचो को प्राप्त नहीं होती। वाणी ही तो है जो मनुष्य की सभ्यता और असभ्यता की पहचान कराती है। जिसकी वाणी खराब उसका ये अमूल्य मनुष्य भव भी बेकार है। क्योंकि जो कार्य एक हथियार नही कर सकता वो वाणी कर सकती है। वाणी मनुष्य को घायल भी कर सकती है और मरहम भी लगा सकती है।

असत्य वचन बोलने से अपयश , अरति , कलह , बैर , बध , बंधन , मरण , जिव्हाछेद , व्रत शील संयमादि का नाश , नरकादि दुर्गतियों में गमन , घोर पाप का आस्रव आदि हजारों दोष प्रगट होते हैं।

जब कि सत्य वचन दया धर्म का मूल है , अनेक दोषों को दूर करने वाला है , या यों कहिये सत्य धर्म संसार सागर से पार उतारने में जहाज के समान है। सत्यवादी की देवता भी सहायता करते हैं। अणुव्रत और महाव्रत भी सत्यव्रती के ही सम्यक होते हैं। और निर्वाण की प्राप्ति भी सत्यव्रती को ही होती है।

इसलिये हे आत्मन् ! सत्य धर्म को धारण करो। क्योंकि हित-मित-प्रिय सत्य वचन बोलने वाला जीव संसार में परिभ्रमण नहीं करता है।

 

उत्तम सत्य वचन मुख बोले ,
सो प्राणी संसार न डोले।

हम सभी के जीवन में सत्य धर्म प्रगट होवें ऐसी मंगल भावना है।

 

नीरज जैन, दिल्ली

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