तीर्थंकर महावीर की अहिंसक क्रांति से ही विश्व में शांति संभव – महावीर जन्मकल्याणक पर विशेष आलेख

जैन परम्परा के 24वें एवं अंतिम तीर्थंकर हैं भगवान महावीर। आपको वर्द्धमान, सन्मति, वीर, अतिवीर के नाम से भी जाना जाता है। ईसा से 599 पूर्व कुण्डलपुर में राजा सिद्धार्थ एवं माता त्रिशला की एक मात्र सन्तान के रूप में चैत्र शुक्ला त्रयोदशी को आपका जन्म हुआ था। 30 वर्ष तक राजप्रासाद में रहकर आप आत्म स्वरूप का चिंतन एवं अपने वैराग्य के भावों में वृद्धि करते रहे। 30 वर्ष की युवावस्था में आप महल छोड़कर जंगल की ओर प्रयाण कर गये एवं वहां मुनि दीक्षा लेकर 12 वर्षों तक घोर तपश्चरण किया। तदुपरान्त 30 वर्षों तक देश के विविध अंचलों में पदविहार कर आपने संत्रस्त मानवता के कल्याण हेतु धर्म का उपदेश दिया। ईसा से 517 वर्ष पूर्व कार्तिक अमावस्या को उषाकाल में पावापुरी में आपको निर्वाण प्राप्त हुआ।

भगवान महावीर सहज साधक थे। किसी प्रकार के प्रदर्शन या उपचार का उनकी दृष्टि में कोई मूल्य नहीं था। भगवान महावीर जन साधारण के बीच रहे और साधारण रूप में रहे। समता भगवान महावीर की साधना का उद्देश्य था और वही फलश्रुति बन गयी। उन्होंने किसी भी परिस्थिति में अपने समत्व को धूमिल नहीं होने दिया। सत्कार और तिरस्कार के मध्य उनके संतुलन का सेतु प्रकम्पित नहींे हुआ। अनुकूलता और प्रतिकूलता उनके मन को प्रभावित नहीं कर सकी।

भगवान महावीर के दर्शन के तीन सिद्धांत अहिंसा, अनेकांत और अपरिग्रह बहुत-सी आधुनिक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत कर सकते हैं। इन्होंने ‘अनेकांत सिद्धांत’ का आदर्श लेकर मानवतावाद की जड़ मजबूत की। विचारों की टकराहट से ही विभिन्न धर्मों में परस्पर द्वेष किया जाता रहा है। भगवान महावीर ने अनेकांत दृष्टिकोण द्वारा इसका समाधान किया है। इसके अन्तर्गत जिसमें सत्याग्रह, व्यापकता, उदारता, सहिष्णुता, अहिंसा,एकता आदि गुण प्रकट होंगे, वह विकास करता हुआ नर से नारायण बन जायेगा। भगवान महावीर ने हमें अनेकांत दृष्टि देकर वस्तु के वास्तविक स्वरूप् का ज्ञान कराया है। साथ ही सास् हमारे भीतर वैचारिक-सहिष्णुता और प्राणीमात्र के प्रति सदभाव का बीजारोपण भी किया है। इस तरह का उपदेश सार्वभौमिक और विश्व शांति की ओर ले जाने वाला है।

भगवान महावीर सामाजिक क्रांति के शिखर पुरूष थे। महावीर का दर्शन अहिंसा और समता का ही दर्शन नहीं  है बल्कि क्रांति का दर्शन है।उन्होंने एक उन्नत और स्वस्थ समाज के लिए नये मूल्य-मानक गढे़। उन्होंने प्रगतिशील विचारों को सही दिशा ही नहीं दी बल्कि उनमें आये ठहराव को तोड़कर नई क्रंाति का सूत्रपात किया। वर्तमान युग में नैतिकता का पतन जिस वेग से हो रहा है , उसकी कभी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। बहुमुखी अधः पतन की इस विभीषिका में भगवान महावीर के अहिंसा, अनेकांत एवं अपरिग्रह सम्बंधी सिद्धांत ही सर्वोदयी सम्भाग का प्रदर्शन कर सकते हैं। उनके सर्वोदय एवं साम्यवादी सिद्धांत स्वस्थ समाज, राष्ट् एवं विश्व का नव-निर्माण कर सकते हैं।

भगवान महावीर का जीवन मानवीय मूल्यों की स्थापना की एक अनवरत और शाश्वत ज्योति की कहानी है। वे मानते हैं जीवन को समान सुख और दुख की अनुभूति होती है। उन्होंने बताया कि धर्म आराधना में जाति, वर्ग, लिंग आदि के भेद के लिए कोई स्थान नहीं है। उन्होंने साम्प्रादायिकता और जातियता को दूर किया। अहिंसा परमो धर्म जैसे महान मूल्य की स्थापना कर भगवान महावीर ने कहा कि सदाचार और नैतिकता का जीवन व्यतीत करते हुए व्यक्ति स्वयं ईश्वरत्व को प्राप्त कर सकता है। दूसरों की भलाई करने, पीड़ितों की रक्षा करने, सहायता करने और पददलितों को सन्मार्ग की राह दिखाने को ही वे धर्म की आन्तरिक क्रियायें मानते थे।

भगवान महावीर के उपदेशों को आज नए संदर्भों में देखने की आवश्यता है। हम जहां-तहां खनिजों की खोज में पृथ्वी को खोद रहे हैं, जल और वायु को प्रदूषित कर रहे हैं, पर्यावरणविद् स्थावरों की इस हिंसा से चितिंत हैं। विकास के नाम पर विलासता बढ़ रही है और साथ ही अमीर और गरीब के बीच की खाई भी बढ़ रही है। बडे़ कष्टों को कौन कहे! हम तो अहंकार पर छोटी-सी चोट पड़ने पर संसार को सिर पर उठा लेते हैं। पचासों बाते हैं, महावीर जन्म कल्याणक पर उनमें से कोई पांच बातें ही तो ग्रहण करें। ऐसा करके हम अपना आत्मकल्याण कर सकेंगे।

अहिंसा और अनेकांत महावीर के उपदेशों का मर्म थे। उन्होंने किसी भी जीव की हत्या न करने, किसी को पीड़ा न पहुंचाने, किसी को दास न बनाने, किसी को यातना न देने और किसी का शोषण न करने का उपदेश दिया। द्वेष और शत्रुता, लड़ाई-झगडे़ और सिद्धांतहीन शोषण के संघर्षरत विश्व में जैनधर्म का अहिंसा का उपदेश  न केवल मनुष्य के लिए बल्कि जीवन के सभी रूपों के लिए एक विशेष महत्व रखता है। इसमें करूणा, सहानूभूति, दान, विश्वबंधुत्व और सर्वक्षमा समाविष्ट हैं। अनेकांत और उसका मर्म अहिंसा प्रतिकूल चिंतन और विचार जागृत होने पर सहिष्णु बने रहने का उपदेश देता है।

भगवान महावीर के मुख्य पांच सि़द्धांतों में अहिंसा, सत्य , अचैर्य, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह मुख्य थे। अहिंसा उनका मूलमंत्र था यानी ‘अहिंसा परमो धर्म’ क्योंकि अहिंसा ही एकमात्र ऐसा शस्त्र है जिससे बडे़ से बड़ा शत्रु भी अस्त्र-शस्त्र का त्याग अपनी शत्रुता समाप्त कर आपसी भाईचारे के साथ पेश आ सकता है।

महावीर ने अहिंसा को बडे़ व्यापक अर्थ में लिया है। प्राणियों का वध करना ही उनकी दृष्टि में हिंसा नहीं है वरन जिन कारणों से दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुंचती हो, कष्ट और दुख पहंुचता हो वह सब हिंसा है और ऐसा कोई कर्म न करना जिससे किसी को शारीरिक या मानसिक आघात पहुंचता हो अहिंसा के अंतर्गत आता है। संसार के प्रथम और अंतिम व्यक्ति हैं भगवान महावीर , जिन्होंने अहिंसा को बहुत की गहरे अर्थोंे में समझा और जिया।

महावीर अहिंसा के दृढ़ उपासक थे, इसलिए किसी भी दिशा में विरोधी को क्षति पहुंचाने की वे कल्पना भी नहीं करते थे, उसको भी नम्रता और मधुरता से ही समझाते थे। महावीर स्वामी का सबसे बड़ा सिद्धांत अहिंसा का है, जिनके समस्त दर्शन, चरित्र, आचार-विचार का आधार एक इसी अहिंसा सिद्धांत पर है। उनका कहना था अहिंसा ही सुख शांति देने वाली है। अहिंसा ही संसार का उद्धार करने वाली है।

महावीर स्वामी ने अपने समय में जिस अहिंसा के सिद्धांत का प्रचार किया, वह निर्बलता और कायरता उत्पन्न करने के बजाय राष्ट् निर्माण और संगठन करके उसे सब प्रकार से सशक्त और विकसित बनाने वाली थी। उसका उद्देश्य मनुष्य मात्र के बीच शांति और प्रेम व्यवहार स्थापित करना था, जिसके बिना समाज कल्याण और प्रगति की कोई आशा नहीं रखी जा सकती। सचमुच महावीर अहिंसा के महान साधक एवं प्रयोक्ता थे। महावीर की अहिंसा जीवों को न मारने तक सीमित नहीं थी। उसकी सीमा सत्य-शोध के महाद्वार का स्पर्श कर रही थी। इसीलिए महावीर स्वामी की मूल शिक्षा अहिंसा है।

भगवान महावीर स्वामी ने अहिंसा का  जितना सूक्ष्म विवेचन किया है। वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। महात्मा गांधी ने अहिंसा के बल पर ही अपने देश को स्वतंत्रता दिलायी। अहिंसा केवल निषेधात्मक ही नहीं होती, अपितु विधेयात्मक भी होती है। तीर्थंकर महावीर के प्रत्येक उपदेश में अहिंसा निहित है। उन्होंने अहिंसक क्रंाति के बल पर विश्वबंधुत्व और विश्वशांति का मार्ग प्रशस्त किया। बाह्य हिंसा की अपेक्षा यदि मानसिक हिंसा दूर हो जाय तो अहिंसक क्रंाति का मार्ग आसानी से प्रशस्त हो सकता है। सभी धर्मांे के प्रति सम्माान की भावना ही आधुनिक युग की सच्ची अहिंसा है।  अहिंसा सभी धर्मों का मूलाधार है। कोई भी धर्म हिंसा की आज्ञा नहीं देता। अहिंसा की रक्षा के लिए हमारी प्रत्येक क्रिया निर्मल होनी चाहिए। भगवान महावीर की पहले की अपेक्षा आज अब अधिक जरूरत है। वाणी में स्याद्वाद, विचारों में अनेकांतवाद, आचरण में अहिंसा का पालन ही महावीर ने श्रेष्ठ धर्म बताया। वैचारिक हिंसा से यदि बचा जाय तो अहिंसा का मार्ग प्रशस्त होता है। भगवान महावीर के समय सबसे बड़ी बुराई वैचारिक मतभेद की पनपी थी और आज भी दुनिया इसी कारण आतंक से संघर्ष कर रही है। इसके लिए महावीर ने स्याद्वाद और अनेकांत का अमोघ सूत्र दिया, जिससे यह बुराई समाप्त हो सकती है। आतंकवाद के सफाये के लिए आज महावीर स्वामी की अहिंसा की परम आवश्यकता है। भगवान महावीर अपने आचरण व व्यवहार के बल से तीर्थंकर कहलाए।

आज जरूरत इस बात की है कि शत्रुता का अंत हो जाए और विश्व में शांति स्थापित हो, क्योंकि बैर से बैर कभी नहीं मिटता। मैत्री और करूणा से ही मानव के मन में, घर में, नगर और देश तथा विश्व में शांति और सुख , अमनचैन की धारा बहती है।

आज देश , विश्व बडे़ बुरे दौर से गुजर रहा है, हम बडे़-बडे़ बमों, आणविक शक्ति से देश में शांति की स्थापना का सपना पाल बैठे हैं। मैं दृृढ़ निश्चय से कह सकता हूं विश्व को आतंकवाद जैसी भयंकर बुराई पर काबू पाने के लिए तीर्थंकर महावीर द्वारा प्रतिपादित अहिंसा एवं अनेकांत-स्याद्वाद के सिद्धांत को अपनाये तो सार्थक हल निकल सकता है।

अहिंसा के महानायक भगवान महावीर ने जल, वृक्ष, अग्नि, वायु और मिट्टी तक में जीवत्व स्वीकार किया है। उन्होंने अहिंसा की विशुद्ध व्याख्या करते हुए जल और वनस्पति के संरक्षण का भी उद्घोष किया। जल के मितव्ययता पूर्ण उपयोग और वनस्पति की सुरक्षा की बात कही। उनके सिद्धांतों पर चलकर हमें वृक्ष बचाओ, संसार बचाओ उक्ति को अमल में लाना होगा। प्रकृति व पर्यावरण के विरूद्ध चलने से भूकंप, सुनामी आदि प्राकृतिक प्रकोपों का हमें सामना करना पड़ रहा है। अतः महावीर स्वामी के सिद्धांतों को आत्मसात कर पर्यावरण  व प्रकृति की सुरक्षा का संकल्प हमें लेना होगा। भगवान महावीर का मार्ग आज के युग की समस्त समस्याओं, मूल्यों की पुनः स्थापना, जीवन में नैतिकता का समावेश, भोगवादिता, संग्रह तथा हिंसा से बचने के लिए सही रास्ता है। महावीर का संदेश आज राजनैतिक, धार्मिक, सामाजिक सभी क्षेत्रों में उपयोगी है। भगवान महावीर आदर्श पुरूष थे। उन्होंने मानवता को एक नई दिशा दी है। उनके बताये हुये अहिंसा, सत्य आदि मार्गोेें पर चलकर विश्व में शांति हो सकती है।

– डाॅ. सुनील जैन ‘संचय’

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