संयम ही जीवन का श्रृंगार है मनुष्य संयम धारण कर सकता है, इसलिए समस्त जीवों में वह श्रेष्ठ है।

ललितपुर। मड़ावरा नगर की हदयस्थली श्री महावीर विद्या विहार में पर्यूषण पर्व के  उत्तम संयम धर्म की पूजा हुई सुबह पण्डित संतोष जैन अमृत के द्वारा बताया गया की सुगंध दशमी के दिन सभी ‍तीर्थंकरों का पूजन इसी मनोभावना के साथ सभी जैन मंदिरों में सुगंध दशमी पर धूप खेई जाती है। भाद्रपद में शुक्‍ल पक्ष की दशमी को यह पर्व मनाया जाता है। इसे सुगंध दशमी अथवा धूप दशमी कहा जाता है  जैन मान्‍यताओं के अनुसार पर्युषण पर्व के अंतर्गत आने वाली सुगंध दशमी का काफी महत्‍व है इसी क्रम में मंदिर पर सुबह 6:30 बजे से भगवान का अभिषेक, शांतिधारा, सुबह श्री जी के अभिषेक शांतिधारा का सौभाग्य श्री नीतू जैन दुकान बाले  कोमल जैन गौना प्रदीप जैन खुटगुवा परिवार को मिला दशलक्षण धर्म पूजन कर श्री एवं तत्वार्थसूत्र वाचना के साथ पूजन अर्चन किया गया शिविर में शिविरार्थियों को ध्यान योग सामायिक साधना अभिषेक पूजन, शांतिधारा गुरूभक्ति, आरती के अलावा मुनिश्री के मंगल प्रवचन  मोक्षमार्ग का प्रतीक मोक्षशास्त्र का विशेष विशलेषण प्रतिक्रमण सामायिक आदि विशेष क्रियायें की गई श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना की श्रद्धालुओं द्वारा दस दिन तक निर्जल उपवास, एकासना तथा विशेष धर्म साधना शुरू की इन दस दिनों में की भक्ति का अलग ही सुख होता है।

आचार्यश्री विशुद्धसागर जी महाराज के परम प्रभावक सुयोग्य शिष्य मुनिश्री श्रमण सुप्रभसागर जी महाराज मुनिश्री श्रमण प्रणतसागर जी महाराज ससंघ के मंगल सान्निध्य में समयसारोपासक साधना संस्कार शिविर का विविध कार्यक्रम के साथ आयोजन किया जा रहा है इस मौके पर सुबह नगर सहित अंचल के सभी जैन मंदिरों पर श्रीजी का अभिषेक, शांतिधारा उपरांत सामूहिक रूप से दशलक्षण पूजन की गई।  मंदिरों पर कई कार्यक्रम हुए शाम को मंदिरों मे भगवान की आरती, स्वाध्याय उपरांत सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए।

दिगंबर जैन मंदिरों में चारों ओर धूप की भीनी-भीनी और सुगंधित खुशबू बिखरी रही। सभी समाजवासियों ने सुगंध दशमी (धूप दशमी) का पर्व उत्साहपूर्वक मनाया।

मुनिश्री ने बताया कि संयम ही जीवन का श्रृंगार है। मनुष्य संयम धारण कर सकता है, इसलिए समस्त जीवों में वह श्रेष्ठ है। जिसके जीवन में संयम नहीं, उसका जीवन बिना ब्रेक की गाड़ी जैसा है। उक्त उद्‍गार परम पूज्य मुनिश्री सुप्रभसागरजी महाराज ने पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के अंतर्गत उत्तम संयम धर्म आराधना के अवसर पर व्यक्त किए।

यदि नदी बिना तटों के बहती है तो वह अपने लक्ष्य से भटककर सागर तक नहीं पहुँचती और सूख जाती। इसी प्रकार संयमी जीवन ही अपने अनंत सुखों को प्राप्त कर सकता है। संयम को धारण करने का हमें पूर्ण अधिकार मिला है लेकिन सांसारिक प्राणी पंचेन्द्रिय विषय के वशीभूत होकर इससे दूर भागते हैं। जिससे वह जीवन रूपी गाड़ी में सफल नहीं हो पाते।

घोड़े को यदि लगाम न लगी हो तो घोड़ा बेकाबू होकर अपने सवार को किसी खड्डे में गिरा देता है, इसी तरह इन्द्रियों पर आत्मा यदि अँकुश न लगावे तो इन्दियाँ भी आत्मा को दुर्गति में डाल देती हैं। इस कारण अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण लगाकर इन्द्रियों को अपने वश में रखना आवश्यक है।

धन की सार्थकता पात्र दान से तथा जीवन की सार्थकता तत्त्वज्ञान से है।

 

— उमेश जैन नैकोर

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