महामस्तकाभिषेक लोगो में स्त्री द्वारा प्रक्षालन दिखाने पर जैन समाज में छिड़ी बहस

श्रवणबेलगोला स्थित 57 फुट ऊंची भगवान बाहुबली की विशाल प्रतिमा देश ही नहीं पूरे वि में अपनी अद्भुत कलाकृति के लिए विख्यात है। इस प्रतिमा का प्रत्येक 12 वर्ष बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष महामस्तकाभिषेक महोत्सव होता है। इसी क्रम में वर्ष 2018 में होने वाले महामस्तकाभिषेक के लोगो में महिला द्वारा प्रक्षालन दिखाये जाने से जैन समाज के लोगों में विवादास्पद चर्चा शुरू हो गई है। आशंका है कि इस विवादास्पद चर्चा से जैन समाज उत्तर भारत एवं दक्षिण भारत में विभाजित न हो जाए। इस बारे में कुछ जैन विद्धानों का मानना है कि यदि इस चर्चा को जल्द विराम न दिया गया तो उक्त महोत्सव तेरापंथ और बीसपंथ के विवाद में उलझ जाएगा। सोशल मीडिया पर इस मुददे को लेकर एक महीने से बहस छिड़ी हुई है। सार्थक वार्ता नाम से देशभर के जैन समाज के प्रमुख लोगों ने एक बड़ा ग्रुप बनाकर इस पर बहस छेड़ रखी है। इस ग्रुप में अधिकांश तेरापंथ से संबंधित हैं, जिनका समाज में खासा प्रभाव है।

वर्ष 2018 में होने जा रहे महामस्तकाभिषेक महोत्सव से जुड़ी आयोजन समिति ने इस बार जो लोगो बताया है, उसमें स्त्री द्वारा भगवान बाहुबली की प्रतिमा का अभिषेक करते दिखाया गया है। कुछ जैनधर्मावलम्बी इस जैन परंपरा के विपरीत मान रहे हैं। उनका कहना है कि जैन धर्म में स्त्री द्वारा प्रक्षालन निषेध है। समिति ने लोगों में ऐसा दिखाकर परंपरा को तोड़ा है। जैन धर्म में तेरापंथ धर्म की स्थापित पौराणिक मूल्य-मान्यताओं एवं नियमों के प्रति सख्त है। वे स्त्री द्वारा प्रक्षालन को शास्त्रोक्त नहीं मानते। उत्तर भारत में तेरापंथ का गढ़ है।

इसके अलावा बीसपंथ समय के अनुसार नियमों में सुधार का पक्षधर है। बीसपंथी स्त्री द्वारा प्रक्षालन के पक्ष में हैं। ऐसी मान्यता है कि दक्षिण भारत में किसी भटटारक जी ने स्त्री द्वारा पक्षालन की शुरूआत करवाई थी, तभी से वहां प्रक्षालन हो रहा है। बता दें कि दक्षिण भारत बीसपंथियों का गढ़ माना जाता है। दक्षिण भारत में बीसपंथियों ने श्रवलबेलगोला में भगवान बाहुबली की प्रतिमा पर स्त्री द्वारा अभिषेक की परंपरा शुरू कर रखी है। श्रवलबेलगोला की व्यवस्थाएं बीसपंथियों के हाथ में हैं। इसमें कोई आपत्ति नहीं कि वे स्त्रियों द्वारा अभिषेक करवाते हैं। चूंकि इस बार के आयोजन के लोगों में उन्होंने इसे दिखाया है, उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। जबकि तेरापंथी में स्त्री द्वारा अभिषेक की मान्यता नहीं है। हालांकि अभी कहना जल्दबाजी होगी कि यह बड़ा मुददा बनेगा या नहीं किंतु इस पर मंथन जरूर चल रहा है।

हम सभी चाहते हैं कि जैन धर्म के मूल्य-मान्यताओं के अनुसार दोनों पक्ष शांतिपूर्ण सौहाद्रपूर्ण वातावरण में इस मुददे को हल कर लें तो जैन समुदाय की एकजुटता के लिए हितकर होगा।

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