सड़कों पर आने के बहाने मत ढूंढो वरना लाशों के ढेर लग जायेंगे : आचार्य पुलक सागर जी

बांसवाड़ा। आचार्य श्री पुलक सागर जी महाराज ने कहा कोरोना वायरस को लेकर सभी को सावधानी बरतनी है। हमारे महापुरुषों ने भी जंगल में रहकर कैसे दिन गुजारे थे, बिना सब्जी के,बिना दूध के हम 21 दिन क्यो नही गुजार सकते।

आचार्य श्री ने कहा घरों पर रहो घर पर है उनका उपयोग करो घर से सड़को पर निकलने  का बहाना मत ढूंढो नही तो जिंदगी उठने मे देर नही लगेगी। ऐसा मत सोचो की वायरस हमारे पास नही आएगा। कही भी कभी भी आ सकता है। अगर हम नही सभले तो फिर यहां  लाशों के ढेर लग जाएगे। इसीलिए भारत बचाओ। साथ ही आचार्य श्री ने कहा किसी ने पूछा दुख से मुक्ति कैसे मिले। आचार्य ने कहा दुख से मुक्ति मिलना सहज नही है, लेकिन असभव भी नही है। दुख से   मुक्ति संभव है,  दुख से मुक्त हुआ जा सकता है आचार्य ने कहा पहले यह देखे सुख की उपलब्धता कैसे हो। यह समझ लेना आवश्यक है। दुख का मतलब है अभाव की जिंदगी जीना। अभाव पर ध्यान रखना, सदभाव को भूल जाना। जो तुम्हारे पास है उसकी फिक्र न करो। जो नही है उसकी चिंता करो। जो है उसको नज़रअंदाज कर दो।जो नही है उसके पीछे भागो। जिसके तुम मलिक हो उसको भुल जाओ।

जिसका पड़ोसी मालिक हो उसका तुम ख्याल रखो और उसके पकड़ने और अपनानें का प्रयास करो, अतीत के सपनो में खोए रहो। यही दुख का मूल काऱण है। सुख का उपाय है सदभाव की जिंदगी जीना। जो है उसका आनंद लो। जितना मिला उसमे संतोष रखना। जो मिला वह खा लिया। कल की फिक्र नही रखना जो पास नही है उसकी चिंता मत करना। वर्तमान में ही जीना। महाराज श्री ने कहा इस जीवन में हर इंसान दुखी है। क्योकि वह अभाव मे जीता है। वह अभाव मे जीने का आदि हो गया है। जो तुम्हारे पास है उसकी तुम परवाह नही करते उसके प्रति तुम लापरवाह बन जाते हो।जो तुम्हारे पास नही है उसके पीछे भागते हो। उसको पाने के लिये तुम रात दिन एक कर देते हो। तुम्हारी रातो की नींद खो जाती है तुम्हारा अमन चैन खो जाता है।

दुख का मुख्य कारण हमारी अधिक इच्छा है। दुख कही बाहर से नही आता बल्कि हमारी कामना से पैदा होता है। वह अपनी कल्पना और वासना से आता है। दुख का उदगम स्थल हम खुद ही है।सुख आकाश से नही टपकता न ही पाताल से आता। सुख का आभास सत्ता नही सत्य है। भगवान महावीर ने कहा सुख तो सत्य में है। जिस प्रकार शक्कर का रस शक्कर मे है उसी प्रकार सुख का आनंद आत्मा में है।आपके पास नब्बे रुपये है और दूसरे के पास 10 रुपए तो हम 10 रुपये पाना चाहते है जिससे कि सो रुपया पूरा हो सके। लेकिन कितने भी दौड़ लो 10 रुपये तुम्हें मिलने वाले नही है।

 

— अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमण्डी

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