बंगाईगांव में बने पहले दिगम्बर मुनी 108 श्री क्षेमंकर सागरजी

बंगाईगांव। धार्मिक अनुष्ठानों, मंत्रोच्चारण और आमंत्रित अतिथियों के बीच दीक्षार्थि को दीक्षा देने के साथ ही धुबड़ी मे एक दिवसीय जैनेश्वरी दीक्षा समारोह सोमवार को संपन्न हो गया। दीक्षा ग्रहण करने वाले के परिवार के सदस्य रिश्तेदर और बंगाईगांव दिगम्बर समाज व अन्यत्र के सभी लोग भी पहुंचे थे। वे सभी उन्हें अपने कंधों पर उठाकर दीक्षा स्थल तक सजे परिधानों में सजाकर ले गये।

प्रवक्ता रोहित कुमार जैन(छाबड़ा) ने जानकारी देते हुये कहा कि धुबड़ी आज पहली बार दिगंबर जैन मुनि की दीक्षा का साक्षी बना। बंगाईगांव के बड़े मार्बल कारोबारी और दिगंबर जैन श्रावक खिवकरन बाकलीवाल सांसारिक सुख-सुविधाएं त्याग कर सोमवार को धुबड़ी स्थित दिगम्बर जैन मंदिर में दिगंबर जैन मुनि की दीक्षा ली यह दीक्षा चर्या शिरोमणि मुनि 108 पुण्यसागर जी महाराज ससंघ ने ब्रह्मचारणी विणा दिदी(बिगुल) व पण्डित हसमुख जैन के सानिध्य मे दिलवाई।

दीक्षा के बाद खिवकरन बाकलीवाल सभी सामाजिक और पारिवारिक बंधनों से मुक्त हो गये, इसमें उनकी पत्नी शांता देवी व पुत्र अनील, सुनिल बाकलीवाल का उन्हें पूर्ण सहयोग प्राप्त है उनके मन मे कल अलग ही खुशी थी कि उनके परिवार में कोई पंचपरमेष्ठी पद में शामिल हुआ, उनको 2 पुत्र, 2 पुत्री और पोता व नातिन भी हैं. घर परिवार, रिश्ते-नाते सभी कुछ छोड़ कर मुनि के रूप में भ्रमण करेंगे, जूते-चप्पल के उम्र भर पैदल ही चलेंगे, किसी भी मौसम में निर्वस्त्र रहेंगे,अपने हाथों से निकालेंगे अपने केश-दाढ़ी व जैन मुनि दीक्षा के लिए वस्त्रों का पूर्ण त्याग, दिन में एक ही बार शुद्ध जल व भोजन का सेवन वो भी खड़े खड़े अपने दोनो हाथों में, सर्दी में भी ओढ़ने-बिछाने के कपड़ों का त्याग, जैसे 28 मूल गुणों का पालन किया जाता है।

धुबड़ी श्री दिगंबर जैन मंदिर में सोमवार को कार्यक्रम सुबह से देर शाम तक चलता रहा। दीक्षार्थी स्थापन, चौक पूजा, केश लोचण के बाद दीक्षार्थि खिवकरन बाकलीवाल को जैन समाज के धर्म गुरु परम पूज्य चर्याशिरोमणि 108 पूण्यसागर जी महाराज ने दीक्षा प्रदान की इसमे उनके माता पिता बनने का सौभाग्य बंगाईगांव के ही मीनेश पहाड़िया व सुचित्रा पहाड़िया को मीला, इसके बाद उनका नामकरण किया और उनका नाम खिवकरन से मुनि 108 श्री क्षेमंकर सागर जी रखा गया जैसे ही उनके नाम का उदबोधन हुआ पुरा धुबड़ी उनकी जयकारो में गुंज उठा अब वह वे जैन मुनि के रूप में जाने  जायेंगे।

महाराज ने दीक्षा देने के बाद पिंछी (संयम का उपकरण), कमंडल (शुद्धि का उपकरण) और शास्त्र (ज्ञान का उपकरण) प्रदान कर उनको को मोक्ष की राह पर प्रवेश दिलाया। इसमे मुनि बनने वाले को पिंछी देने का सोभग्य अनील कुमार सुनील कुमार बाकलीवाल परिवार को मीला, व कमंडल देने का सोभाग्य ग्रहस्थ जीवन के जवाई कमल कुमार संजय कुमार बड़जात्या परिवार को मिला व शास्त्र भेट करने का सौभाग्य बीजु पाटनी परिवार बारसोई को मीला ओर केशलोंच झेलने का सौभाग्य पोते पोती व नातीन को मीला। इस अवसर पर समस्त बंगाईगांव सहित अन्यत्र के जैन अनुयायियों ने शिरकत की।

श्री दिंगबर जैन समाज बंगाईगांव के कार्यकारी अध्यक्ष मनोज शरावगी(मिन्टू) ने अपने उदबोधन में बताया कि धुबड़ी में यह पहला मौका था जब दीक्षा समारोह आयोजित किया गया। दीक्षा प्राप्ति के बाद अब दीक्षार्थी अपने घर और परिवार को त्याग कर मुनि श्री पुण्यसागर की छत्रछाया में रहेंगे और जैन धर्म के विस्तार और प्रचार में देश भर का भ्रमण करेंगे। ओर उन्होंने धुबड़ी जैन समाज को अनेको धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि आपकी यह धरा पवित्र हो गई जिसमें आज जैनेश्वरी दीक्षा हो गई और साथ ही बंगाईगांव भी सौभाग्य शाली है की पहला व्यक्ति व इस धरा का पहला सपुत्र आज मुनी बनकर मोक्ष की राह पर निकल पड़ा

कार्यकारी अध्यक्ष मनोज़ शरावगी(मिंटू) ने जानकारी देते हुए ने कहा इन्होंने ली दीक्षा…

बंगाईगांव के रहने वाले खिवकरन जी बाकलीवाल (85) एक मार्बल के व्यापारी थे। इनके के दो बेटे अनील व सुनील व दो बेटी नीलम व मीतू हैं। यह बहु ही सरल स्वभवि व मधुरभाषी है इन्होंने अपनी ग्रहस्थ जीवन की जिम्मेदारीया भी बखूबी निभाई अब समाज की जिम्मेवारी भी बखुबी निभाने निकल पड़े।

इनका नाम के साथ जीवन भी बदल गया

इनका नाम के साथ जीवन भी सोमवार से बदल गया। अब इनका नाम खिवकरन से मुनी 108 क्षेमंकर सागर जी हो गया ओर अब वह मोह का त्याग कर मोक्ष के मार्ग पर प्रस्थान कर गए।

बंगाईगांव के विनोद जैन (पाटनी) ने भी अपनी अभिव्यक्ति देते हुए बंगाईगांव में कहा कि जहा पूण्य का संबल मिल जाता है वहा कदम अपने आप रूक जाया करता है। यही तो नियति है, जो एक रंक को भी  राज्याभिषेक (मूनि पद शिरोधार्य) करा देती है। चिंतामणि रत्न से अलंकृत कराके हमै भी गौरवान्वित होने का अवसर दे देती है।

श्री मान खींवकरण जी बाकलिवाल, बंगाईगाव निवासी सूजानगढ़ प्रवासी जिसे हम बंगाईगाव गोरव भी कह सकते है। इन्होने अपने जीवन गाथा मै 1 बार दशलक्षन व्रत, 7 बार सोलहकारण व्रत, 1 बार सोलहकारण(32 उपवास) पालन करने का परम सौभाग्य पाया ,जो अपने आप मै एक कीर्तिमान है।

जीवन के उत्तरार्द्ध मै संचय किया हूवा पूण्य का अवतरित होना और धूबडी मै 108 श्री पूण्य सागरजी महाराज का सानिध्य मिलना और दीक्षा स्वरूप महान मूनि पद को धारण करके मूनि श्री 108 क्षेमंकर महाराज के नामकरण से सुशोभित हुए।

अपने धर्ममयी जीवन के व्रत साधना के अमूल्य धरोहर को सही दिशा मै आज चरितार्थ होते  हुए आज हम देख रहे है और  सभी उन्हे निहार भी रहे है। यही तो जैन धर्म की वास्तविक सौन्दर्यता है, जिसको हम सभी नमन करते है।

खूशी के इस महान अवसर हम सभी उनके परिवार के सभी सदस्यो को साधुवाद देते है। धन्य है आपकी प्रवल भावना।

धन्य हो गए आज बंगाईगाव के सभी श्रावकगण ।

जैनत्व के शिखरतम पद को धारण करके समाधि की और बढाते कदम को हम बारंबार नमोस्तु करते है।

समाज के प्रवक्ता रोहित छाबड़ा ने बताया कि बंगाईगांव का सौभाग्य है कि हमारा समाज के खिवकरन जी महाराज बन गये ओर बंगाईगांव का नाम पूरे देश पटल पर गौरवान्वित किया और ये बंगाईगांव से ये ऐसे पहले व्यक्ति है जिन्होंने दिगम्बर मुनि दीक्षा ग्रहण की। बंगाईगांव से आए सैकड़ों लोग सुबह से शाम तक कार्यक्रम स्थल पर बैठे रहे। बंगाईगांव से सभी लोग बस में भरकर कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आए थे।

         — रोहित कुमार जैन(छाबड़ा)

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