क्षमा हमें सहनशीलता से रहने की प्रेरणा देता है: मुनिश्री सुप्रभसागर जी महाराज

मड़ावरा। ग्यारह जिनालयों की धर्म नगरी मड़ावरा में नगर की हदयस्थली श्री महावीर विद्या विहार में  दशलक्षण पर्व का पहला दिन उत्तम क्षमा धर्म के रूप में मनाया गया चर्याशिरोमणि आचार्यश्री विशुद्धसागर जी महाराज के परम प्रभावक सुयोग्य शिष्य  मुनिश्री श्रमण सुप्रभसागर जी महाराज मुनिश्री श्रमण प्रणतसागर जी महाराज ससंघ के मंगल सान्निध्य में समयसारोपासक साधना संस्कार शिविर का विविध कार्यक्रम के साथ आयोजन किया जा रहा है जिसमें उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त मध्यप्रदेश महाराष्ट्र राजस्थान आदि अनेक प्रान्तों से शिविरार्थियों ने भाग लिया है।

इस मौके पर सुबह नगर सहित अंचल के सभी जैन मंदिरों पर श्रीजी का अभिषेक, शांतिधारा उपरांत सामूहिक रूप से दशलक्षण पूजन की गई। प्रथम दिन उत्तम क्षमा दिवस मंदिरों पर कई कार्यक्रम हुए शाम को मंदिरों पर भगवान की आरती, स्वाध्याय उपरांत सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए। जैन मंदिरों पर भक्तों का तांता लगा रहा। इसी क्रम में मंदिर पर सुबह 6:30 बजे से भगवान का अभिषेक, शांतिधारा, दशलक्षण धर्म पूजन कर श्री एवं तत्वार्थसूत्र वाचना के साथ पूजन हुआ

जो कि शिविर में शिविरार्थियों को ध्यान योग सामायिक साधना अभिषेक  पूजन, शांतिधारा गुरूभक्ति, आरती के अलावा मुनिश्री के मंगल प्रवचन मोक्षमार्ग का प्रतीक मोक्षशास्त्र का विशेष विशलेषण प्रतिक्रमण सामायिक आदि विशेष क्रियायें सिखाई जा रही है।

दिगंबर जैन समाज ने दशलक्षण पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व का शुभारंभ मंगलवार को उत्तम क्षमा धर्म के साथ हुआ। पंडित संतोष जी शास्त्री अमृत ललितपुर ने मंत्रोच्चरन किया भोपाल के गीतकार कुलदीप जैन एंड पार्टी  के मधुर स्वर लहरों के साथ दसलक्षण पूजन की गई। नाशिक महाराष्ट्र से आये हुए योगाचार्य राजेश जी जैन द्वारा शिविरार्थियों योग ध्यान सीखाया जा रहा है।

दिगंबर जैन समाज में पयुर्षण पर्व दशलक्षण पर्व के प्रथम दिन उत्तम क्षमा, दूसरे दिन उत्तम मार्दव, तीसरे दिन उत्तम आर्जव, चौथे दिन उत्तम सत्य, पांचवें दिन उत्तम शौच, छठे दिन उत्तम संयम, सातवें दिन उत्तम तप, आठवें दिन उत्तम त्याग, नौवें दिन उत्तम आकिंचन तथा दसवें दिन ब्रह्मचर्य तथा अंतिम दिन क्षमावाणी के रूप में मनाया जाएगा। दशलक्षण पर्व के दौरान जिनालयों में धर्म प्रभावना की जाएगी

धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए मुनिश्री सुप्रभसागर जी महाराज ने बताया कि क्षमा हमें सहनशीलता से रहने की प्रेरणा देता है। अपने मन में क्रोध को पैदा न होने देना और अगर हो भी जाए तो अपने विवेक से, नम्रता से उसे विफल कर देना अपने भीतर आने वाले क्रोध के कारण को ढूँढकर, क्रोध से होने वाले अनर्थों के बारे में सोचना और अपने क्रोध को क्षमारूपी अमृत पिलाकर अपने आपको और दूसरों को भी क्षमा की नजरों से देखना अपने से जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए खुद को क्षमा करना और दूसरे के प्रति भी इसी भाव को रखना इस पर्व का महत्व है।

तो आइए अभी भी देर नहीं हुई है। इस क्षमा धर्म से खुद को और औरों को भी रोशनी का नया संकल्प पाठ गढ़ते हुए क्षमा धर्म का असली आनंद उठाए और खुद भी जिये और दूसरों को भी जीने दे के संकल्प पर चलते हुए उत्तम क्षमा धर्म का लाभ उठाएँ।

“उत्तम क्षमा, सबको क्षमा, सबसे क्षमा” अतः हम हमारे पारिवारिक,  सामाजिक व अन्य सभी स्थानों में देखे तो क्षमा मांगने का कार्य तो बड़ा है ही साथ ही दूसरों को क्षमा प्रदान करना उससे भी बड़ा कार्य है,  इसलिए पर्युषण पर्व क्षमा से प्रारंभ होकर क्षमा में ही सम्पन्न होता है। कल उत्तम मार्दव धर्म की पूजा की जाएगी मार्दव- चित्त में मृदुता व व्यवहार में नम्रता होना सिखाता है।

 — उमेश जैन नैकोरा

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