जैन मुनि सुधासागर ने की गुरु शिष्य संबंधों की व्याख्या

ब्यावर | जैनसंत सुधासागर महाराज ने मंगलवार को पंचायती नसियां में आयोजित चातुमार्सिक प्रवचन में कहा कि गुरु एवं शिष्य का संबंध बड़ा ही अटूट और एक दूसरे से आत्मीयता से जुड़ा रहता है। सीधे तौर पर यदि देखा जाए तो यह याद और दया का पूरक है। यदि आप गुरु को याद करेंगे तो वे आप पर जरूर दया करेंगे। गुरु की दृष्टि में जीने वाला व्यकित अपने जीवन के मूल उद्देश्यों को समझ सकता है।

आदमी गुरु के पास लेने जाता है, लेकिन देना कोई नहीं चाहता। लोग बिना कुछ दिए आशीर्वाद लेना भी नहीं छोड़ते। गुरु को अपने शिष्य से कोई धन-दौलत नहीं चाहिए, अगर शिष्य अपने गुरु के प्रति मन में श्रद्धा और विश्वास का भाव रखेंगे। तब गुरु अपने शिष्य को आशीर्वाद देंगे। महाराजश्री ने कहा कि अपने बड़ों से मांगने की नहीं, बल्कि देने की आदते डालनी चाहिए। आज हर व्यक्ति भगवान से मांगना या अपने संकटों को दूर करना चाहता है। लेकिन भगवान के संकट हरने कोई नहीं जाता। इस बात को महाराजश्री ने श्रीराम और हनुमानजी का उदाहरण देते हुए समझाया।

उन्होंने कहा कि हनुमानजी का नाम संकटमोचन यूं ही नहीं पड़ा, हनुमानजी ने भगवान श्रीराम के प्रति अटूट श्रद्धा रखी और उनके संकटों को हरने का प्रयास किया। हनुमानजी ने अपने संपूर्ण कर्म भगवान श्रीराम को समर्पित कर दिए। इसलिए आज दुनिया श्रीरामजी से ज्यादा हनुमानजी को पूजती है और संकटमोचन का नाम भी दिया है। महाराजश्री ने कहा कि हमें दुर्योधन का भाव नहीं रखकर हनुमानजी का भाव रखना चाहिए। व्यक्ति को ऐसा बनना चाहिए कि वह अपनी समस्याएं भगवान के समक्ष नहीं रखें, बल्कि भगवान की समस्याओं के प्रति चिंता रखनी चाहिए।

  •  अभिषेक जैन लुहाडिया

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