स्वयं को आत्म धर्म से प्रभावित कर लेना ही सच्ची प्रभावना है मुनि श्री विशोक सागर जी

खनियाधाना – खनियांधाना नगर मे विराजमान गणाचार्य श्री विराग सागर जी महाराज जी के परम शिष्य ओजस्वी  बक्ता 108 मुनि श्री विशोक सागर जी महाराज एवं 108 मुनि श्री विधेय सागर जी महाराज जी का वर्षा योग श्री 1008 पार्ष्वनाथ दिगम्बर जैन बडा मंदिर जी में चल रहा है । मुनि श्री विशोक सागर महाराज जी ने प्रवचन मे कहा कि अज्ञान रूपी अंधकार के विनाश को जिस प्रकार बने उस प्रकार से दूर करके जिन मार्ग का समस्त मतावलम्बियों में प्रभाव प्रकट सो प्रभावना है। आगमार्थ का नाम प्रवचन है उसका वर्णन अर्थात् कीर्ति विस्तार या बृद्धि करने को प्रवचन है की प्रभावना और उसके भाव को प्रवचन प्रभावना कहते हैपर समय रूपी जुगुनओं के प्रकाश को पराभूत करने पाले ज्ञान रवि की प्रभा से इंद्र के सिहासन को कंपा देने वाले मासोपवासादि सम्यक तपों से तथा भव्यों के हृदय रूपी कमलों को विकसित करने के लिये सूर्य प्रभा के समान जिन पूजा के द्वारा सद्धर्म का प्रकाश करना मार्ग प्रभावना है। महापुराणदि धर्मकथा के व्याख्यान करने से,हिंसादि दोश रहित – तपचरण करने से, जीवों की दया व अनुकंपा करने से  आदि के माध्यम से जिन धर्म की प्रभावनकरनी चाहिये। परवादियों को जीतना ,अष्टांग निर्मित्त ज्ञान ,पूजा,दान आदि के माध्यम से भी प्रभावना की जा सकती है व्यक्ति विशेष या व्यक्त्वि की प्रभावना धर्म प्रभावना नहीं अपितु प्रभावना का अर्थ धार्मिकता है। प्राणी मात्र को धर्म के प्रति जागरूक कर देना उनके अंदर धार्मिकता का प्रादुर्भाव कर देना ही वास्तविक धर्म प्रभावना है। अप्रभावना के हेतुओं से बचने का उद्यम ही प्रभावना को उत्पन्न कराता है।

यदि हमारे उपदेश से एक व्यक्ति का भी हृदय परिवर्तित होता है, और वह धर्म के पथ पर अपने कदम अग्रसित कर लेता है तो यही वास्तविक मार्ग प्रभावना है। स्वयं को आत्म धर्म से प्रभावित कर लेना ही सच्ची प्रभावना है।पूजन ,विधान, पंचकल्याणक प्रतिष्ठा, जपानुष्ठान, भजन आदि के माध्यम से जिन धर्म को प्रकाशित करना मार्ग प्रभावना है।किसी को सदुपदेश देकर उसके अंदर के मिथ्यात्व को हटाकर सम्यक्त्व रूप प्रकाश को उद्धोतित करना ही सच्ची मार्ग प्रभावना है।श्री महावीर भगवान के संदेशों को जन जन तक पहुँचाना भी प्रभवना का अंग बनता है।साधु संतों की निर्मल चर्या , मोन ब्रती भी प्रभवना का बहुत बड़ा अंग बनती है।मार्ग प्रभवना हेतु प्राणों का त्याग भी करना पड़े तो भी सतत तैयार रहना चाहिए।

  • स्वप्निल जैन (लकी)

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