दिगम्बर जैन मंदिर में मनाया गया भगवान पार्श्वनाथ का निर्वाण महोत्सव , श्रद्धालुओं ने चढ़ाया निर्वाण लाडू।

मोक्ष सप्तमी पर्व के उपलक्ष्य में कदमकुआं , कांग्रेस मैदान स्थित श्री 1008 पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में भगवान पार्श्वनाथ का मोक्ष कल्याणक महोत्सव धूमधाम के साथ आयोजित किया गया। श्रावण शुक्ल सप्तमी के दिन बुधवार को जैन धर्म के 23 वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के मोक्ष कल्याणक के अवसर पर श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक निर्वाण लाडू चढ़ाया।

इस अवसर पर पटना के सभी जिन मंदिर श्री कमलदह जी , मीठापुर , नया टोला , आदि जैन मंदिरों में जैन समाज ने निर्वाण लाडू चढ़ाया। संगीतमय वातावरण के बीच प्रातः बेला में जिनेन्द्र प्रभु का 108 कलशों से महामस्तकाभिषेक किया गया। तत्पश्चात महाशांतिधारा किया गया , जिसका उच्चारण जैन मुनि ने किया। शांतिधारा का सौभाग्य अजित कुमार जैन ‘एडवोकेट’ सपरिवार को प्राप्त हुआ।

इसके उपरांत जैन अनुयायियों द्वारा नित्य नियम पूजा – अर्चना , भगवान पार्श्वनाथ विधान सहित विशेष धार्मिक अनुष्ठान किया गया। भक्तिमय वातावरण में प्रभु भजन पर श्रद्धालुगण झूम उठे और गुरु भक्ति का खूब आनंद उठाया। गुरुभक्त प्रवीण जैन ने बताया कि जैन संत आचार्य श्री 108 विपुल सागर जी महाराज , आचार्य श्री भद्रबाहु सागर जी महाराज , मुनि श्री भरतेश सागर जी महाराज ससंघ के सानिध्य में श्रावकों ने हर्षोल्लास पूर्वक निर्वाणकांड पाठ के उच्चारण के साथ मूलनायक भगवान पार्श्वनाथ के समक्ष भव्य निर्वाण लाडू चढ़ाया।

मुकुट सप्तमी का पर्व जैन धर्म के 23 वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के मोक्ष कल्याणक के अवसर पर जैन धर्मावलंबी मनाते है। जिन्हें झारखंड के तीर्थराज श्री सम्मेद शिखर जी स्वर्ण भद्र टोंक से मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। जबलपुर से पधारे बा•ब्र• त्रिलोक भैया जी के मौजूदगी में यह विशेष आयोजन किया गया।

इस अवसर पर जैन संत आचार्य श्री भद्रबाहु सागर जी महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए पीयूष वाणी में कहा कि जिस प्राणी का मोक्ष हो जाता है उसका मनुष्य भव में जन्म लेना सार्थक हो जाता है। जब तक संसार है तब तक चिंता रहती है। हमें अपनी आत्मा को परमात्मा बनाने के लिए मोहरूपी शत्रु का नाश करना पड़ता है।

अत: हमें सभी का सम्मान करना चाहिए। सब बड़ों के प्रति विनय भाव रखना चाहिए क्योंकि विनय ही मोक्ष का द्वार है। इसीलिए सभी को चैतन्य प्रभु से रिश्ता जोड़ना चाहिए क्योंकि पुण्यात्मा जहां भी चरण रखते हैं वहां से दुख, अंधकार, कषाय, क्लेश स्वमेव ही प्रकाश व सुखों में परिवर्तित हो जाते हैं। इस मौके पर संध्या बेला में 108 दीपकों से महाआरती , संध्या भजन का आयोजन किया गया। इस विशेष आयोजन पर बड़ी संख्या में जैन समाज शामिल हुए।

 

— प्रवीण जैन (पटना)

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