पंचमकाल में शिथिलाचारी, वेषधारी, नाममात्र के साधुओं का होगा बाहुल्य-साध्वी सुरंजनाश्री

बाड़मेर, 05 नवम्बर। साध्वी सुरंजनाश्रीजी महाराज ने स्थानीय जैन न्याति नोहरा में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को दिपावली प्रवचन के अन्तर्गत संबोधित करते हुए कहा कि चरम तीर्थंकर शासनपति श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने अपापापुरी में निर्वाण से पूर्व 16 प्रहर तक 18 देश के राजाओं सहित उपस्थित धर्मसभा को सर्वजीव हितकारी अनमोल देशना फरमाई। उसी अनुपम देशना को प्रभु के प्रथम पट्टधर आर्य सुधर्मास्वामी ने द्वितीय पट्टधर जम्बूस्वामी को सुनाई।

पाटानुपाट इस वीरवाणी का मौखिक रूप से स्वाध्याय चलता रहा। भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण के लगभग 980 वर्ष पश्चात् एक पूर्वी आचार्य देवद्धिगणि क्षमाक्षमण के समय अन्य आगामों के साथ भगवान की अंतिम वाणी का भी उतराध्ययन सूत्र के रूप में लिपीबद्ध संकलन किया गया।

साध्वी श्री ने कहा कि पुण्यपाल राजा ने परमात्मा के सन्मुख उपस्थित होकर रात्रि के समय हाथी, बन्दर, क्षीरतरू, कौआ, सिंह, पद्म, बीज और कुंभ आदि आठ अशुभ स्वप्न देखे जिसका फल बताने का निवेदन किया जिस परमात्मा ने जगत के जीवों पर उपकार कर भविष्य में होने वाली घटनाओं का फल बताया और कहा कि हाथी देखना इस भावी का सूचक है कि अब भविष्य में विवेकशील श्रमणोपासक भी क्षणिक समृद्धि सम्पन्न गृहस्थ जीवन में हाथी की तरह मदोन्मत रहेगें।

जो गृह त्याग कर संयम ग्रहण करेगें, उनमें से भी अनेक कुसंगति में फंसकर या तो संयम का परित्याग कर देगें या अच्छी तरह संयम का पालन नहीं करेगं। विरले ही संयम का दृढ़ता से पालन कर सकेगें। दूसरे स्वप्न में कपि दर्शन इस अनिष्ट का सूचक है कि भविष्य में बड़े-बड़े आचार्य भी बंदर की तरह चंचल प्रकृति के प्रमादी होगें। तीसरे स्वप्न में क्षीरतरू देखने का फल कालस्वभाव से अब आगामी काल में क्षुद्र भाव से दान देने वाले श्रावकों को साधु नामधारी पाखण्डी लोग घेरे रहेगें।

पाखण्डियों की प्रवंचना में फंसे हुए दानी सिंह के समान आचारनिष्ठ साधुओं को श्रृगालों की तरह शिथिलाचारी श्रृगालवत् शिथिलाचारी साधुओं को सिंह के समान आचारनिष्ठ समझेगें। यत्र-तत्र कण्टकाकीर्ण बबूल की तरह पाखण्डियों का पृथ्वी पर बाहुल्य होगा। चैथे स्वप्न में काक दर्शन का फल बताते हुए कहा कि भविष्य में अधिकांश साधु अनुशासन का उल्लंघन एवं साधु मर्यादाओं का परित्याग कर कौवे की तरह विभिन्न पाखण्ड पूर्ण पंथों का आश्रय ले मत परिवर्तन करते रहेगें।

पांचवे स्वप्न में सिंह को विपन्नावस्था में देखा उसका फल बताते हुए भगवान महावीर ने कहा कि भविष्य में सिंह के समान तेजस्वी वीतराग प्ररूपित जैन धर्म निर्बल होगा, धर्म की प्रतिष्ठा से विमुख हो लोग हीन सत्व, साधारण श्वानादि पशुओं के समान मिथ्या मतावलम्बी साधु वेषधारियों की प्रतिष्ठा करने में तत्पर रहेगें। छठे स्वप्न में कमलदर्शन का फल समय के प्रभाव से आगामी काल में सुकुलीन व्यक्ति भी कुसंगति भी कुसंगति में पड़ कर धर्ममार्ग से विमुख हो पापाचार में प्रवृत होगें।

सांतवे स्वप्न में बीज दर्शन इस भविष्य का सूचक है कि जिस प्रकार एक अविवेकी किसान अच्छे बीज को ऊसर भूमि में और धुन से बींदे हुए खराब बीज को उपजाउ भूमि में बो देता है उसी प्रकार गृहस्थ श्रमणोपासक आगामीकाल में सुपात्र को छोड़कर कुपात्र को दान करेगे। भगवान महावीर स्वामी ने राजा पुण्यपाल को अंतिम आठवें स्वप्न का फल सुनाते हुए फरमाया कि अंतिम स्वप्न में कुंभ देखना इस आशय का द्योतक है कि भविष्य में तप, त्याग एवं क्षमा आदि गुण-सम्पन्न आचारनिष्ठ महामुनि विरले ही होगें।

इसके विपरीत शिथिलाचारी, वेषधारी, नाममात्र के साधुओं का बाहुल्य होगा। शिथिलाचारी साधु निर्मल चारित्र वाले साधुओं से द्वेष रखते हुए सदा कलह करने के लिये उद्यत रहेगें। ग्रह-ग्रस्त की तरह प्रायः सभी गृहस्थ तत्वदर्शी साधुओं और वेषधारी साधुओं के भेद से अनभिज्ञ, दोनों को समान समझते हुुए व्यवहार करेगें।

निर्वाण लड्डू एवं नव वर्ष की मांगलिक 08 नवम्बर को-

खरतरगच्छ संघ चातुर्मास समिति के मिडिया प्रभारी चन्द्रप्रकाश बी. छाजेड़ व अशोक संखलेचा ‘भूणिया’ ने बताया कि 08 नवम्बर को प्रातः 5.30 बजे जैन न्याति नोहरा से गुरूमैंया की निश्रा में गाजे-बाजे एवं सकल संघ के साथ भगवान महावीर निर्वाण एवं अंनंत लब्धिनिधान गौतमस्वामी के केवलज्ञान का लड्डू चढ़ाने के लिए खागल मौहल्ला स्थित आदिनाथ जिनालय पधारेगे। जहां पर सर्वप्रथम नूतन वर्ष पर जिनालय का द्वारोद्धघाटन होगा तत्पश्चात् लड्डू चढ़ाया जायेगा व गुरूवर्याश्री के मुखारविन्द से नववर्ष महामांगलिक एवं गौतम रास, भक्तामर स्त्रोत, दादा गुरूदेव का इकतीसा का वांचन किया जायेगा।

 

प्रेषक- चन्द्रप्रकाश बी. छाजेड़

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