अधर्म, अन्याय, पापियों के नाश के लिए शस्त्र उठाना, हिंसा नहीं : सुधा सागर

यदि मनुष्य अधर्म, अन्याय और पापियों का नाश करने के लिए शस्त्र उठाता है तो वह हिंसा नहीं, बल्कि अहिंसा है क्योंकि अधर्मियों का नाश करने से ही धर्म और धर्मात्मा की रक्षा की जा सकती है। राजस्थान के टोंक नगर में संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर महाराज के परम प्रभावक शिष्य मुनि पुंगव सुधा सागर जी एक धर्मसभा को संबोधित करते हुए यह बात कही। उन्होंने आगे कहा कि हिंसा-अहिंसा के अर्थ को सही तरीके से समझने की जरूरत है। उन्होंने एक उदाहरण देकर समझाया कि एक सुअर ने मुनि की रक्षा के लिए एक सिंह को घायल कर मार दिया। यह हिंसा नहीं है क्योंकि यदि वह मुनि की रक्षा के लिए ऐसा नहीं करता तो वह सिंह मुनि के प्राण ले लेता। अत: प्रयोजन को समझ कर ही हिंसा-अहिंसा के मार्ग को अपनाना चाहिए।

जैन धर्म में एक चींटी को मारना भी पाप की श्रेणी में आता है। इसीलिए हम पानी भी छानकर पीते हैं किंतु अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना, अन्यायियों को मारना कदापि हिंसा नहीं है। मुनिश्री ने आगे कहा कि क्रोध आने से पूर्व अपने भविष्य के बारे में सोचें। जैन धर्म उपदेश देता है कि क्रोध को मारो, क्रोध मत करो। क्रोध करने से पहले अपने घर-परिवार और आने वाले कल की चिंता करो। मैं कहता हूं कि क्रोध स्वयं शांत हो जाएगा। क्रोध में किया गया कार्य आपके भविष्य को संकट में डाल सकता है। क्रोध के कारण अपराध करने वाले व्यक्ति जेल में जाते हैं।

अपने परिवार, बच्चों और मां-बाप की चिंता सताती रहती है। यदि वह इन सब बातों को अपराध करते समय ध्यान में रखता तो आज वह अपने खुशहाल परिवार के बीच रह रहा होता। उन्होंने कहा कि कोई भी मनुष्य पाप करने में असमर्थ नहीं है किंतु लोग पाप करने से पूर्व उसके दुष्परिणामों के बारे में जान लेते तो वे पाप के रास्ते को नहीं अपनाते। मुनिश्री ने भगवान श्रीराम का उदाहरण देते हुए बताया कि जब भगवान राम को वनवास भेजा गया तो इन्होंने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया।  उनको पता था कि उनके हाथ से राजगददी छीनी जा रही है। वे चाहते तो युद्ध करके, माता कैकेई का अपमान करके राजगददी प्राप्त कर सकते थे लेकिन उन्होंने खुशी-खुशी पिता के वचनो के लिए 14 वर्ष के वनवास को स्वीकारा।

यह सब देख लक्ष्मण क्रोधित हुए किंतु श्रीराम ने भविष्य को देखते हुए तुरंत क्रोध पर काबू पाकर निर्णय लिया कि उन्हें राजगददी छोड़ वनवास का मार्ग चुनकर  ज्यादा यश मिलेगा। मुनिश्री ने कहा कि ज्ञानी को कभी असमर्थ मत समझो, वह पाप भी कर सकता है किंतु वह यह करने से पूर्व हानि-लाभ के बारे में सोचकर ही अपना निर्णय लेता है। ऋषभदेव ने कहा है कि इस संस्कार को तत्व के नजरिये से देखो। दुनिया की कोई भी वस्तु बुरी नहीं है। बस उसका उपयोग कैसा हो, मूल बात यह है।

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