अथ नवग्रह शांति स्तोत्रम् (संस्कृत) – Ath Navgrah Shanti Stotram(Sanskrit)

आचार्य भद्रबाहु स्वामी
Acharya Bhadrabahu swami

जगद्गुरुं नमस्कृत्यं, श्रुत्वा सद्गुरुभाषितम् |
ग्रहशांतिं प्रवचयामि, लोकानां सुखहेतवे ||

जिनेन्द्रा: खेचरा ज्ञेया, पूजनीया विधिक्रमात् |
पुष्पै- र्विलेपनै – र्धूपै – र्नैवेद्यैस्तुष्टि – हेतवे ||

पद्मप्रभस्य मार्तण्डश्चंद्रश्चंद्रप्रभस्य च |
वासुपूज्यस्य भूपुत्रो, बुधश्चाष्टजिनेशिनाम् ||

विमलानंत धर्मेश, शांति-कुंथु-अरह-नमि |
वर्द्धमानजिनेन्द्राणां, पादपद्मं बुधो नमेत् ||

ऋषभाजितसुपाश्र्वा: साभिनंदनशीतलौ |
सुमति: संभवस्वामी, श्रेयांसेषु बृहस्पति: ||

सुविधि: कथित: शुक्रे, सुव्रतश्च शनैश्चरे |
नेमिनाथो भवेद्राहो: केतु: श्रीमल्लिपार्श्वयो: ||

जन्मलग्नं च राशिं च, यदि पीडयंति खेचरा: |
तदा संपूजयेद् धीमान्-खेचरान् सह तान् जिनान् ||

आदित्य सोम मंगल, बुध गुरु शुक्रे शनि:।
राहुकेतु मेरवाग्रे या, जिनपूजाविधायक:।।

जिनान् नमोग्नतयो हि, ग्रहाणां तुष्टिहेतवे |
नमस्कारशतं भक्त्या, जपेदष्टोतरं शतं ||

भद्रबाहुगुरुर्वाग्मी, पंचम: श्रुतकेवली |
विद्याप्रसादत: पूर्ण ग्रहशांतिविधि: कृता ||

य: पठेत् प्रातरुत्थाय, शुचिर्भूत्वा समाहित: |
विपत्तितो भवेच्छांति: क्षेमं तस्य पदे पदे ||

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