जैन योग के बिना भारतीय योग अधूरा है

जैन परंपरा में ध्यान योग साधना प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव से ही मानी जाती है। वे आदि योगी के रूप में हम सभी के समक्ष आते हैं। मोहन जोदड़ो और हड़प्पा में जिन नग्न योगी की मूर्ति हमें प्राप्त हुई है उसका सम्बन्ध जितना तीर्थंकर ऋषभदेव से मेल खाता है उतना अन्य परंपरा के इष्ट देव से नहीं मिलता। इस बात का समर्थन करने वाले कई विद्वान हैं। यद्यपि बहुमत के अतिरेक में, अपने मत के प्रति आग्रह बुद्धि की प्रबलता के कारण तथा प्रचार बाहुल्य के कारण अधिकांश लोग यही मानते हैं कि वह मूर्ति शिव की है। किन्तु इस मान्यता पर पुनर्विचार अवश्य होना चाहिए। हम इस बात से भी पूरी तरह इनकार नहीं कर सकते कि शिव भी मूलतः ऋषभ ही हैं क्यों कि ऋषभदेव का समय प्राग्वैदिक सिद्ध हो चुका है। विद्वानों के द्वारा अनेक अनुसंधानों के बाद ऋषभ और शिव में काफी कुछ साम्यता भी सिद्ध की जा चुकी है।

प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव से लेकर अंतिम तीर्थंकर महावीर तक ध्यान योग साधना का क्रम निर्बाध गति से चलता रहा ,उसके बाद जम्बू स्वामी तक भी ध्यान योग साधना अपने  पूर्ण रूप को लिए हुए मुक्ति का साधन बनी हुई थी। उसके बाद साधना के क्रम में शारीरिक संहनन की निरंतर कमी के चलते परिवर्तन प्रारंभ हो गए और प्रायोगिक ध्यान योग साधना की निरंतरता  में कुछ कमी आने लगी,किन्तु सैद्धांतिक अवधारणा ज्यों की त्यों बनी रही। जैन परंपरा का आचारमीमांसा सम्बंधित जितना भी साहित्य है वह पूरा का पूरा प्रायोगिक योग है और द्रव्यानुयोग का साहित्य ध्यान योग के भाव और दार्शनिक पक्ष के वर्णन में संलग्न है। एक प्रकार से मुक्ति की साधना की पूरी पद्धति योग ही है जिसमें भाव और क्रिया पक्ष दोनों की संयुति अनिवार्य अंग है।

इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि जैन-बौद्ध और वैदिक साधना पद्धतियों ने सदा एक दूसरे को प्रभावित किया है। सभी परम्पराओं ने एक दूसरे की उन विशेषताओं को ग्रहण किया है जिनसे उनकी मूल साधना में कोई विघ्न न आये बल्कि साधना अभ्यास अधिक परिष्कृत हो। यह तथ्य भी किसी से छिपा हुआ नहीं है कि पतंजलि का योग दर्शन आरम्भ की अवस्था में निरीश्वरवादी सांख्य था जो कालांतर में ईश्वरवादी होकर ईश्वर प्रणिधान की चर्चा करने लगा। श्रमण सांख्य को अपने से निकला हुआ एक अंग मानते हैं जो भिन्न मान्यता के कारण श्रमण से अलग हो गया था किन्तु उसके संस्कार वही थे। भारत में इस तरह के वैचारिक आदान प्रदान की अपनी एक विशाल परंपरा रही है जिसने सभी मान्यताओं को समृद्धि प्रदान की है।

जैन पारम्परा में ध्यान- योग  जहाँ अर्धमागधी आगमकाल में शारीरिक एवं मानसिक तत्त्वों को प्रभावित करने वाला माना जाता था, वहीं बाद में यह केवल मानसिक एवं आत्मपरक हो गया। लगभग दसवीं शती तक समय के प्रभाव से और पतंजलि के योगदर्शन की प्रचुरता से  इस विवरण में क्रियात्मक योग के तत्त्व पुनः समाहित हुए जिससे यह पुनः त्रिरूपात्मक हो गया । इससे इसकी व्यापकता बढ़ी । यद्यपि सभी भारतीय पद्धतियाँ ध्यान का चरम लक्ष्य एक ही मानती हैं, पर लौकिक जीवन  से सम्बन्धित लक्ष्यों में विभिन्न दार्शनिक मान्यताओं में विविधता पाई जाती है।

ध्यान-योग के शारीरिक एवं मानसिक प्रभावों के विषय में जैन आचार्यों ने अपने अनेक अनुभव और निरीक्षण भी बतलाये हैं। जिन पर अब भारत और विश्व के अनेक देशों में वैज्ञानिक शोध की जा रही है। अधिकांश लौकिक शास्त्रीय विवरण इस पद्धति से न केवल पुष्ट ही हुए हैं अपितु शरीर विज्ञान, रसायन, मनोविज्ञान एवं चिकित्सा विज्ञान के अध्येताओं ने इन विवरणों की अपने निरीक्षणों द्वारा सफल एवं प्रयोगसिद्ध व्याख्या की है। यही नहीं, अनेक निरीक्षणों से हमारे ध्यान-सम्बन्धी प्रक्रियाओं के ज्ञान में भी तीक्ष्णता, यथार्थता और सूक्ष्मता आई है। यही कारण है कि इस युग में योग और ध्यान की प्रक्रिया हेतु अधिकारियों पर लगे प्रतिबन्ध शनैः शनैः स्वयं समाप्त होते जा रहे हैं और यह प्रत्येक व्यक्ति के दैनंदिन जीवन का एक अंग बनता जा रहा है। इससे ध्यान के कुछ अलौकिक प्रभावों पर भी आस्था बढ़ रही है।

वर्तमान में ध्यान का लौकिक आधार अधिक व्याख्यायित हो रहा है ,उसका सबसे बड़ा कारण यह है कि मनुष्य कृत्रिम चिंताओं,तनावों,अवसादों,कुंठाओं से ज्यादा व्यथित है और उसके शारीरिक रोगों का यह सबसे बड़ा कारण है |बात इसलिए भी सही है कि समस्त संसार से विरक्त होकर ,गार्हस्थ्य जीवन त्याग कर मोक्ष मार्ग की साधना की घोषणा करने वाले कई साधू संत भी अवसाद जैसी मानसिक बीमारियों की चपेट में हैं | अध्यात्म के लिए सबसे पहले मानसिक रूप और शारीरिक रूप से सामान्य रहने की आवश्यकता है |ध्यान योग मोक्ष का मार्ग है किन्तु मोक्ष का पथिक यदि इस प्रकार से अस्वस्थ्य होगा तो उसकी साधना कैसे हो पायेगी ?

अतः ध्यान-योग की उन लौकिक विधियों को आज ज्यादा मान्यता मिल रही है जो मनुष्य को मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ्य बनाये रखने में कारगर हो। इसलिए वर्तमान में जिन जैन ध्यान योग की प्रयोगिक पद्धतियों का विकास हो चला है वे मोक्ष के लिए साधकों को स्वस्थ्य बनाने पर ज्यादा जोर दे रही हैं। उसका अध्यात्म भी शारीरिक स्तर का है। यद्यपि मूल अवधारणा आज भी आत्मानुभूति की ही है लेकिन प्रायोगिक रूप में वह भी शब्दजाल में बंधकर रह गयी है। वर्तमान में प्रचलित कुछ ध्यान योग की पद्धतियां युगचेतना से ज्यादा प्रभावित हैं। वर्तमान में जितने भी प्रमुख साधक आचार्य या संत हैं उतने ही प्रकार की ध्यान साधना पद्धति अनेक प्रकार के नामों से चल रही है। उनका मूल उत्स आज भी वही है किन्तु संज्ञाएँ भिन्न भिन्न हैं। इनके एकीकरण का भी प्रयास होना चाहिए –यह एक विनम्र सुझाव मैं देना चाहती हूँ।

अंत में मैं एक निवेदन सम्पूर्ण साधक और विचारक जगत से यह भी करना चाहती हूँ कि आप जैन योग ध्यान साधना के इतिहास ,अध्यात्म,दर्शन और प्रयोगों के योगदान को नजरअंदाज न करें। भारत वर्ष की यह भी एक अमूल्य धरोहर है। मेरा यह स्पष्ट मानना है कि यदि इसकी उपेक्षा करके भारत की योग ध्यान साधना की बात की जाएगी तो वह अधूरी होगी।

 

 

 

— Smt.Ruchi ‘Anekant’ Jain

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