जैनियों का महापर्व है पर्युषण पर्व

जैन धर्म में दशलक्षण पर्व का विशेष महत्व होता है।आत्मा को परमात्मा बनाने का यह एक अनूठा पर्व है।जैनदर्शन में दशलक्षण पर्व का विशेष महत्व बतलाया गया है।

पर्यूषण पर्व जैनों का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्व है। यह पर्व बुरे कर्मों का नाश करके हमें सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।भगवान महावीर के सिद्धांतों को ध्यान में रखकर हमें निरंतर और खासकर पर्यूषण के दिनों में आत्मसाधना में लीन होकर धर्म के बताए गए रास्ते पर चलना चाहिए।

पर्यूषण का अर्थ-

पर्युषण का अर्थ है परि यानी चारों ओर से, उषण यानी धर्म की आराधना।श्वेतांबर धर्म की मान्यता वाले अनुयायी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से शुक्ल पक्ष की पंचमी और दिगंबर धर्मानुलम्बी भाद्रपद शुक्ल की पंचमी से चतुर्दशी तक यह पर्व मनाते हैं।

यह पर्व महावीर स्वामी के मूल सिद्धांत अहिंसा परमो धर्म,जिओ और जीने दो की राह पर चलना सिखाता है तथा मोक्ष प्राप्ति के द्वार खोलता है।इस पर्वानुसार- ‘संपिक्खए अप्पगमप्पएणं’ अर्थात आत्मा के द्वारा आत्मा को देखो।

पर्यूषण पर्व के दो भाग हैं- पहला तीर्थंकरों की पूजा,सेवा और स्मरण तथा दूसरा अनेक प्रकार के व्रतों के माध्यम से शारीरिक,मानसिक व वाचिक तप में स्वयं को पूरी तरह समर्पित करना।इस दौरान बिना कुछ खाए और पिए निर्जला व्रत करते हैं।

श्वेतांबर समाज 8 दिन तक पर्यूषण पर्व मनाते हैं जिसे ‘अष्टान्हिका’ कहते हैं जबकि दिगंबर 10 दिन तक मनाते हैं जिसे वे ‘दसलक्षण’ कहते हैं। ये दसलक्षण हैं- उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव,सत्य,संयम,शौच,तप,त्याग,आकिंचन्य एवं ब्रह्मचर्य हैं।

इन दिनों साधुओं के लिए 5 कर्तव्य बताए गए हैं- संवत्सरी, प्रतिक्रमण, केशलोचन, तपश्चर्या, आलोचना और क्षमा-याचना। गृहस्थों के लिए भी शास्त्रों का श्रवण,तप, अभयदान, सुपात्र दान, ब्रह्मचर्य का पालन, आरंभ स्मारक का त्याग, संघ की सेवा और क्षमा-याचना आदि कर्तव्य कहे गए हैं।

दशलक्षण महापर्व के दस दिन हैं-

उत्तम क्षमा

उत्तम मार्दव

उत्तम आर्जव

उत्तम शौच

उत्तम सत्य

उत्तम संयम

उत्तम तप

उत्तम त्याग

उत्तम आकिंचन्य

उत्तम ब्रह्मचर्य

दसलक्षण पर्व पर इन दस धर्मों की पूजा को किया जाता है।

01-उत्तम क्षमा धर्म-

हम उनसे क्षमा मांगते है जिनके साथ हमने बुरा व्यवहार किया हो और उन्हें क्षमा करते है जिन्होंने हमारे साथ बुरा व्यवहार किया हो। सिर्फ इंसानों के लिए ही नहीं बल्कि हर एक इन्द्रिय से पांच इन्द्रिय जीवों के प्रति जिनमें जीव है उनके प्रति भी ऐसा भाव रखते हैं।

उत्तम क्षमा धर्म हमारी आत्मा को सही राह खोजने में और क्षमा को जीवन और व्यवहार में लाना सिखाता है जिससे सम्यक दर्शन प्राप्त होता है। सम्यक दर्शन वो चीज है जो आत्मा को कठोर तप त्याग की कुछ समय की यातना सहन करके परम आनंद मोक्ष को पाने का

प्रथम मार्ग है।इस दिन बोला जाता है-

सबको क्षमा सबसे क्षमा ॥

02- उत्तम मार्दव धर्म-

धन,दौलत,शान और शौकत इंसान को अहंकारी और अभिमानी बना देता है ऐसा व्यक्ति दूसरों को छोटा और अपने आप

को सर्वश्रेष्ठ मानता है,यह सब चीजें नश्वर हैं।यह सब चीजें एक दिन आप को छोड देंगी या फिर आपको एक दिन  इन चीजों को छोडना ही पडेगा।नश्वर चीजों के पीछे भागने से बेहतर है कि अभिमान और परिग्रह सब बुरे कर्म में बढोतरी करते हैं। जिनको छोडा जाये और सब से विनम्र भाव रखकर सभी जीवों के प्रति मैत्री भाव रखें क्योंकि सभी जीवों को जीवन जीने का अधिकार है।

उत्तम मार्दव धर्म हमें अपने आप की सही वृत्ति को समझने का जरिया है। सभी को एक न एक

दिन जाना ही है तो फिर यह सब परिग्रहों का त्याग करें और बेहतर है कि खुद को पहचानों और परिग्रहों का नाश करने के लिए खुद को तप,त्याग के साथ साधना रुपी भट्ठी में झोंक दो क्योंकि इनसे बचने का और परमशांति मोक्ष को पाने का साधन साधना ही एकमात्र विकल्प है।

03-उत्तम आर्जव धर्म 

हम सब को अपना  सरल स्वभाव रखना चाहिए और जहाँ तक बने उतना कपट का त्याग करना चाहिए।कपट के भ्रम में जीना

दु:खी होने का मूल कारण है।

आत्मा ज्ञान, खुशी,प्रयास,विश्वास जैसे असंख्य गुणों से सिंचित है उसमें इतनी ताकत है कि केवल ज्ञान को प्राप्त कर सकें।उत्तम आर्जव

धर्म हमें सिखाता है कि मोह-माया, बुरे कर्म सब छोडकर सरल स्वभाव के साथ परम आनंद मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं।

04- उत्तम शौच धर्म-

किसी चीज की इच्छा होना इस बात का प्रतीक है कि हमारे पास वह चीज नहीं है तो बेहतर है की हम अपने पास जो है उसके लिए परमात्मा का उपकार मानकर उसे धन्यवाद दें।  संतोषी बनकर उसी में काम चलायें।भौतिक संसाधनों और धन दौलत में खुशी को खोजना यह महज आत्मा का एक भ्रम है। उत्तम शौच

धर्म हमें यही सिखाता है कि शुद्ध मन से जितना मिला है उसी में खुश रहो परमात्मा का हमेशा शुक्रिया मानों और अपनी आत्मा को शुद्ध बनाकर ही परम आनंद मोक्ष पद को प्राप्त करना बडा ही मुश्किल है।

झूठ बोलना बुरे कर्म में बढोतरी करता है।

05-सत्य जो ‘सत’ शब्द से आया है जिसका मतलब है वास्तविक होना।

उत्तम सत्य धर्म हमें यही सिखाता है कि आत्मा की प्रकृति जानने के लिए सत्य आवश्यक है और इसके आधार पर ही परम आनंद मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है। अपने मन आत्मा को सरल और शुद्ध बना लें तो सत्य अपने आप ही आ जाएगा।

06- उत्तम संयम धर्म-

इंद्रियों पर संयम रखना ही उत्तम संयम धर्म  है।अपने मन को स्थिर रखना ही संयम है।संयम को धारण करके मनुष्य मोक्ष पद को प्राप्त कर सकता है।

07-उत्तम तप धर्म- 

तप का मतलब सिर्फ उपवास भोजन नहीं करना सिर्फ इतना ही नहीं है बल्कि तप का असली मतलब है कि इन सब क्रिया के साथ अपनी इच्छाओं को वश में रखना ऐसा तप अच्छे गुणवान कर्मों में वृद्धि करते है। साधना इच्छाओं की वृद्धि ना करने का एकमात्र मार्ग है ।पहले तीर्थंकर भगवान आदिनाथ ने करिब छह महीनों तक ऐसी तप साधना की थी और परम आनंद मोक्ष को प्राप्त किया था।

हमारे तीर्थंकरों जैसी तप साधना करना इस वर्तमान समय में मुश्किल है। हम भी ऐसी ही भावना रखते है और पर्यूषण पर्व के 10 दिनों के दौरान उपवास, ऐकाशन करतें है और परम आनंद मोक्ष को प्राप्त करने की राह पर चलने का प्रयत्न करते हैं।

08-उत्तम त्याग धर्म-

‘त्याग’ शब्द से ही पता लग जाता है कि इसका मतलब छोडना है और जीवन को संतुष्ट बना कर अपनी इच्छाओं को वश में करना है यह न सिर्फ अच्छे गुणवान कर्मों में वृद्धि करता है बल्कि बूरे कर्मों का नाश भी करता है ।

छोडने की भावना जैन धर्म में सबसे अधिक है क्योंकि जैन संत सिर्फ घरद्वार ही नहीं यहां तक कि अपने कपडों का भी त्याग कर देते हैं और सम्पूर्ण जीवनभर दिगंबर मुद्रा धारण करके समाधि मरण की भावना को रखते हैं।

उत्तम त्याग धर्म हमें यही सिखाता है कि मन को संतोषी बनाके ही इच्छाओं और भावनाओं का त्याग किया जा सकता है।त्याग की भावना भीतरी आत्मा को शुद्ध बनाकर ही होती है।

09-उत्तम आकिंचन्य धर्म-

उत्तम आँकिंचन धर्म हमें मोह को त्याग करना

सिखाता है।आत्मा के भीतरी मोह जैसे गलत मान्यता, गुस्सा, घमंड, कपट, लालच, मजाक, पसंद नापसंद, डर, शोक, और वासना इन सब मोह का त्याग करके ही आत्मा को शुद्ध बनाया

जा सकता है।सब मोह पप्रलोभनों और परिग्रहो को छोडकर ही परम आनंद मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है।

10-उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म- 

उत्तम ब्रह्मचर्य हमें सिखाता है कि उन परिग्रहों का त्याग करना जो हमारे भौतिक संपर्क से

जुडी हुई हैं।जैसे जमीन पर सोना न कि गद्दे तकियों पर, जरुरत से ज्यादा किसी वस्तु का उपयोग न करना,व्यय, मोह,वासना ना रखते सादगी से जीवन व्यतीत करना।

‘ब्रह्म’ जिसका मतलब आत्मा, और ‘चर्या’ का मतलब रखना। ब्रह्मचर्य का मतलब अपनी

आत्मा में रहना है।ब्रह्मचर्य का पालन करने से आपको पूरे ब्रह्मांड का ज्ञान और शक्ति प्राप्त होगी और ऐसा न करने पर आप सिर्फ अपनी इच्छाओं और कामनाओं के गुलाम ही हैं।

उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म के दिन शाम को प्रतिक्रमण करते हुए पूरे साल में किये गए पाप और कटू वचन से किसी के दिल को जानते और अनजाने ठेस पहुंची हो तो क्षमा याचना करते हैं।एक दूसरे को क्षमा करते है और एक दूसरे से क्षमा माँगते हैं और हाथ जोड कर गले मिलकर मिच्छामी दूक्कडम करते हैं।उत्तम क्षमा बोलकर वर्ष में हुई गलतियों की क्षमा एक दूसरे से मांगते हैं।पर्यूषण पर्व के समापन पर ‘विश्व-मैत्री दिवस’ अर्थात संवत्सरी पर्व मनाया जाता है। अंतिम दिन दिगंबर ‘उत्तम क्षमा’ तो श्वेतांबर ‘मिच्छामि दुक्कड़म्’ कहते हुए लोगों से क्षमा मांगते हैं।

दस धर्मों का सार-

दस  धर्मो  का बाग है सुन्दर।

इन्हें  सजा  लो अपने अंदर

तन  मन  जीवन भी महकेंगा

कर्म  धूल  सारी हर लेगा

“क्षमा” –  क्रोध से दूर करेगा

“मार्दव” –  मन का मान हरेगा

“आर्जव” – सीधी चाल बनाता

“सत्य” – ज्ञान का रूप दिखाता

‘शौच” –  लोभ को दूर भगाए

“संयम” – आतम स्वस्थ बनाये

“तप” – से अपना नाता जोड़ो

“त्याग” – से अपना मुख न मोड़ो

“आकिंचन” – का पालन करना

“ब्रह्मचर्य” – को धारण करना

‘दस धर्मो” – का करो आचरण

आतम  का   हो  जाये जागरन

आतम  का   दर्शन  करवायें

आतम   आनन्द   पा   हर्षाय।।

 

-पुष्पेंद्र जैन

 

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