जानिए जैन धर्म में क्यों मनाया जाता है श्रुत पंचमी महापर्व

(जैन परंपरा में श्रुतपंचमी महापर्व का है विशेष महत्व। इस दिन जैन परंपरा का प्रथम ग्रंथ लिपिबद्ध किया गया था, इसके पूर्व ज्ञान को कंठ में रखने की परंपरा थी। इसलिए इस महापर्व को पूरे भारत देश में अतीव हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। जगह-जगह शास्त्रों की शोभायात्रा निकाली जाती है, शास्त्रों की विशेष पूजा की जाती है। अप्रकाशित प्राचीन ग्रंथों के प्रकाशन की योजनायें क्रियान्वित होती हैं। शास्त्रों के वेष्टन बदले जाते हैं,  तरह-तरह से सजाया जाता है। शास्त्र संरक्षण को लेकर सेमीनार और गोष्ठियों का आयोजन किया जाता है।)

ज्येष्ठ शुक्ल की पंचमी तिथि जैन परंपरा में सदियों से मनाई जा रही है। इस दिन शास्त्र भण्डारों में रखे प्राकृत, संस्कृत, अपभ्रंश आदि प्राचीन भाषाओं में हस्तलिखित प्राचीन मूल शास्त्रों को शास्त्र भण्डार से बाहर निकाल कर भगवान की वेदी के समीप विराजमान करके उनकी पूजा की जाती है। सुरक्षा की दृष्टि से शास्त्रों को बांधने वाले वस्त्र आदि को बदलकर उन्हें नए वस्त्रों में सुरक्षित किया जाता है। साथ ही अप्रकाशित दुर्लभ ग्रंथ प्रकाशित करने की योजनाएं बनाई जाती है। गृहस्थ लोग शास्त्रों की सुरक्षा के लिए शास्त्रों के प्रकाशन हेतु यथा शक्ति दान करते है। श्रुतपंचमी जैनधर्म में शास्त्र अवतरण का पर्व कहा जाता है। महावीर जयंती आदि की तरह से ही इस ज्ञान पर्व को बडे़ उत्साह व श्रद्धा-आस्था के साथ मनाया जाता है। इस दिन शास्त्रों की विशेष पूजा-अर्चना के साथ विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं शोभा यात्रायें निकाली जाती हैं। यह पर्व ज्ञान आराधना का मांगलिक महापर्व है।

जैन श्रमणाचार्यों ने जब यह अनुभव किया कि शिष्य वर्ग की स्मरण शक्ति उत्तरोत्तर क्षीण होती जा रही है, जिनवाणी को सुरक्षित नहीं रखा जा सकेगा, इनके न रहने से ज्ञान भी नहीं रहेगा। अतः ज्ञान की परम्परा को शताब्दियों तक अबाद्यरूप से सुरक्षित करने के लिए इनका लिपिबद्ध होना आवश्यक हैं। तब शास्त्रों का लेखन किया गया। श्रुत परम्परा सिर्फ जैन धर्म दर्शन में ही नहीं वैदिक परंपरा में भी चरर्मोत्कर्ष पर रही है।

जैनधर्म में आगम को भगवान महावीर की द्वादशांगवाणी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसे भगवान महावीर के बाद से चली आ रही श्रुत परम्परा के अन्तर्गत आचार्यों के द्वारा जीवित रखा गया। इसके अंतर्गत तीर्थकर केवल उपदेश देते थे और उनके गणधर उसे ग्रहण कर सभी को समझाते थे। उनके मुख से जो वाणी जन कल्याण के लिए निकलती थी, वह अत्यन्त सरल एवं प्राकृत भाषा में ही होती थी, जो उस समय सामान्यतः बोली जाती थी। उनके अतिशय के कारण जो भी उसे सुनता था, उसे लगता था कि वह उसी की भाषा में कही गयी है और उसके हृदय को स्पर्श करती है। तीर्थकर भगवान महावीर ने अपने ग्यारह गणधरों अर्थात् श्रुतकेवलियों ने इन्हें इसी गुरू परंपरा के आधार पर अपने शिष्यों तक पहुॅचाया।

भगवान महावीर की उत्तरवर्ती आचार्य परम्परा में लगभग दो हजार वर्ष पूर्व अग्रणी धरसेनाचार्य का नाम आता है। गुजरात प्रान्त में स्थित श्री गिरनार पर्वत की चन्द्र गुफा में वयोवृद्ध आचार्यरत्न परम पूज्य 108 धरसेनाचार्य महाराज जप तप ध्यान और स्वाध्याय में निमग्न थे। वे एक दिन विचार करने लगे कि जैन दर्शन और सिद्धांत का जो ज्ञान अभी तक अर्जित कर पाया हॅू वह मेरी जिव्हा तक सीमित है, भविष्य में जब मेरी समाधि हो जाएगी तो सम्पूर्ण ज्ञान भी विलुप्त हो जाएगा, अतः उन्होंने दक्षिण पथ की महिमा नगरी के मुनि सम्मेलन को श्रुत रक्षा सम्बन्धि पत्र लिखा। उनके पत्र की व्यथा से पूज्य अर्हदबलि वात्सल्य से द्रवीभूत हो गए और उन्होंने अपने संध के युवा तथा विद्धान मुनिद्वय श्री पुष्पदन्त जी एवं श्री भूतबलि जी को गिरनार पहुॅचकर ग्रंथ लेखन की आज्ञा दे दी।

फलतः देानों परम प्रतापी मुनिराज गिरनार पर्वत की ओर विहार कर गए। जब वे दो मुनि गिरनार की ओर आ रहे थे, तब यहाॅ श्री धरसेनाचार्य ऐसा शुभ स्वप्न देखा कि दो श्वेत  वृषभ आकर उनकी विनय पूर्वक वंदना कर रहे हैं। आचार्य श्री महान प्रज्ञाश्रमण थे वे स्वप्न का अर्थ समझ गए कि दो योग्य मुनि दक्षिण से मेरी ओर आ रहे हैं। उन्हें अपार हर्ष हुआ, उन्हें विश्वास हो गया कि अब श्रुत लेखन का कार्य संभव हो सकेगा, अतः खुशी के वेग में उनके मुख से दो शब्द स्फुर हो पडे़ हो ‘‘जयदु सुद देवदा’’ अर्थात् श्रुत की जय हो। दूसरे दिन दोनों मुनिवर वहाॅ आ पहुॅचे और विनय पूर्वक उन्होंने आचार्य के चरणों में वंदना की। दो दिन पश्चात श्रीधरसेनाचार्य ने विद्यामंत्र देकर उनकी परीक्षा की। एक को अधिकाक्षरी और दूसरे को हीनाक्षरी मंत्र बताकर उनसे उन्हें षष्ठोपवास से सिद्ध करने को कहा। जब मंत्र सिद्ध हुआ तो एक के समक्ष दीर्घ दन्त वाली ओर दूसरे के सम़क्ष एकाक्षी चेहरे वाली देवी प्रकट हुई। उन्हें देखते ही मुनियों ने समझ लिया कि आचार्य श्री द्वारा मंत्र लेखन में सोच समझकर कोई श्रुटि की गई है। उन्होंने पुनः मंत्रों को शुद्ध करके सिद्ध किया। जिसमें देवियाॅ अपने स्वाभाविक सौम्य रूप में प्रकट हुई।

आचार्यश्री को उनकी सुपात्रता पर विश्वास हो गया। अतः उन्हें अपना शिष्य बनाकर उन्हें सैद्धान्तिक देशना दी। यह श्रुत अभ्यास आषाढ़ शुक्ला एकादशी को समाप्त हुआ। आचार्य भूतवलि और आचार्य पुष्पदन्त ने धरसेनाचार्य की सैद्धान्तिक देशना को श्रुतज्ञान द्वारा स्मरण कर उसे षट्खण्डागम नामक महान जैन परमागम के रूप में रचकर ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी के दिन प्रस्तुत किया। इस शुभ अवसर पर अनेक देवी-देवताओं ने तीर्थंकरों की द्वादशांग वाणी के अंतर्गत महामंत्र णमोकार से युक्त जैन परमागम षट्खण्डागम की पूजा की तथा सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इस दिन से श्रुत परंपरा को लिपिबद्ध परम्परा के रूप में प्रारंभ किया गया। अतः यह दिवस शास्त्र उन्नयन के अंतर्गत श्रुतपंचमी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इस दिन से श्रुत परम्परा को लिपिबद्ध परम्परा के रूप में प्रारंभ किया गया तथा पुस्तकारूढ़ किया गया। अतः यह दिवस शास्त्र उन्नयन के अंतर्गत ‘श्रुतपंचमी’ नाम से प्रसिद्ध हुआ। दूसरे रूप में इसे ‘शास्त्र दिवस’ के नाम से भी संबोधित किया गया। जैन परम्परा का साहित्य भारतीय संस्कृति का अक्षय भण्डार है। जैनाचार्यों ने ज्ञान-विज्ञान की विविध विधाओं पर विपुल मात्रा में स्वपरोपकार की भावना से साहित्य का सृजन किया। आज भी अनेक शास्त्र-भण्डारों में हस्तलिखित प्राचीन गं्रथ विद्यमान हैं, जिनकी सुरक्षा, प्रचार-प्रसार, संपादन, अनुवाद की आज की आवश्यता है।

जैन परंपरा में श्रुतपंचमी महापर्व का है विशेष महत्व। इस दिन जैन परंपरा का प्रथम ग्रंथ लिपिबद्ध किया गया था, इसके पूर्व ज्ञान को कंठ में रखने की परंपरा थी। इसलिए इस महापर्व को पूरे भारत देश में अतीव हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। जगह-जगह शास्त्रों की शोभायात्रा निकाली जाती है, शास्त्रों की विशेष पूजा की जाती है। अप्रकाशित प्राचीन ग्रंथों के प्रकाशन की योजनायें क्रियान्वित होती हैं। शास्त्रों के वेष्टन बदले जाते हैं,  तरह-तरह से सजाया जाता है। शास्त्र संरक्षण को लेकर सेमीनार और गोष्ठियों का आयोजन किया जाता है।

-डाॅ. सुनील जैन संचय

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