आचार्यश्री अमृतचंद्राचार्य द्वारा रचित ग्रन्थ “पुरुषार्थ सिद्ध्युपाय” आत्मा से परमात्मा की और ले जाने का साधन


इस ग्रन्थ के रचियता आचार्य अमृतचन्द्र जी का नाम आचार्य कुन्दकुन्द के बाद लिया जाता हैं .इनके द्वारा पांच ग्रन्थ रचे गए हैं जो संस्कृत में हैं .

पुरुषार्थसिद्धि उपाय ग्रंथ परमपूज्य आचार्य श्री अमृतचंद्रसूरि द्वारा रचित एक महान ग्रंथ है। इस ग्रंथ में श्रावकधर्म एवं मुनिधर्म का विशदरूप से, अच्छी तरह विवेचन किया गया है। ग्रंथ का मंगलाचरण करते हुए आचार्यश्री ने लिखा है-

तज्जयति परं ज्योति: समं समस्तैरनंत पर्यायै:।
दर्पण तल इव सकला, प्रति फलति पदार्थमालिका यत्र।।१।।

इसका पद्यानुवाद मुक्तकछंद में —

सम्पूर्ण पदार्थों के समूह, जिसमें दर्पणवत् झलक रहे।
अरु भूत भविष्यत् वर्तमान की, पर्यायें भी शोभित हैं।।
जो पूर्ण ज्ञान सहजानंदी, नित ज्ञाता दृष्टारूप कहे।
वह परं ज्योति प्रतिबिम्ब रूप, चैतन्य सदा जयवंत रहे।।१।

इस ग्रंथ में आचार्य ने पाँच अधिकारों में विषयस्वरूप को लिया है। इसमें पंच पापों का त्याग, अष्टमूलगुणों का पालन एवं सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यग्चारित्र का स्पष्टरूप से विवेचन किया है। प्रथम अधिकार में मंगलाचरण में भगवान के गुणों को नमन करके अनेकांत धर्म को नमस्कार किया है और यह बताया है कि सम्पूर्ण पदार्थों की सिद्धि अनेकांत धर्म के द्वारा ही होती है। ज्ञानी पुरुष जब स्याद्वाद विद्या के प्रभाव से अनेक धर्म स्वरूप वस्तु का निर्णय करके भिन्न-भिन्न कल्पनाओं को दूर कर देता है, तब उसे ही अनेकांत कहते हैं। पुन: ‘पुरुषार्थसिद्धिउपाय’ शब्द की परिभाषा किया है-

विपरीताभिनिवेशं निरस्य सम्यग्व्यवस्य निज तत्त्वम्।
यत्तस्मादविचलनं स एव पुरुषार्थसिद्ध्युपायोऽयम्।

पद्यानुवाद-

जो अन्य वस्तु निजमान यही, विपरीत मान्यता दूर करें।
निज के द्वारा ही निज स्वभाव की, यथारूप पहिचान करें।।
अरु निज स्वरूप से कभी न च्युत, हो आत्मगुणों में लीन रहें।
वह ही सच्चा रत्नत्रय जो, पुरुषार्थ सिद्धि का मार्ग कहें।।

‘पुरुष’ यानि आत्मा के लिए मोक्षसिद्धि के उपाय का जिसमें विवरण है, उसका नाम है ‘पुरुषार्थसिद्धिउपाय’। पुन: इस अधिकार में व्यवहार साधक, निश्चयनय साध्य, व्यवहारनय कारण, निश्चयनय कार्य इत्यादिरूप से विवरण किया है। पुन: श्रावकधर्म की मुख्यता लेकर कहा है कि जिस प्रकार मुनि पूर्णरूपेण रत्नत्रय गुण को धारण करते हैं उसी प्रकार श्रावक को भी यथाशक्तिरूप से रत्नत्रय गुण धारण करना चाहिए। सम्यग्दर्शन का लक्षण बताते हुए सम्यग्दर्शन के आठ अंगों का सुन्दर वर्णन किया है। इस अधिकार में विशेष बात एक यह बतलाई कि जो वक्ता प्रथम मुनिधर्म का उपदेश न देकर श्रावक धर्म का उपदेश देता है, वह वक्ता दण्ड का पात्र होता है।

द्वितीय अधिकार में सम्यग्ज्ञान का वर्णन करते हुए कहा है कि भव्यजीवों को सम्यग्दर्शनपूर्वक सम्यग्ज्ञान नयप्रमाण सहित नित्य ही आराधन करने योग्य है। केवली भगवान को सम्यग्दर्शन ज्ञान एक साथ ही उत्पन्न होते हैं, पर छद्मस्थ जीवों को सम्यग्दर्शन ज्ञान क्रम से उत्पन्न होता है। सम्यग्ज्ञान की आराधना कैसे करना चाहिए? उसका उपाय क्या है? आचार्य बताते हैं-

ग्रन्थार्थोभयपूर्णं काले विनयेन सोपधानं च।
बहुमानेन समन्वितमनिघ्नवं ज्ञानमाराध्यम्।।

पद्यानुवाद-

जो शब्द अर्थ अरु उभयरूप से, योग्यकाल में शुद्ध हुआ।
उपधान विनय कर देव शास्त्र, गुरु के प्रति नित बहुमान किया।।
अरु निन्हव दोष रहित विद्या, गुरु के प्रति कभी न कपट किया।
यह आठ हि सम्यग्ज्ञान अंग जो, लहें मुक्ति पद धार लिया।।

शब्दाचार, अर्थाचार, उभयाचार, कालाचार, विनयाचार, उपधानाचार, बहुमानाचार, अनिन्हवाचार ये ज्ञान के ८ अंग बताए हैं, जिन्हें मानव अपने अंदर उतारकर अपने जीवन को सफल करता है।

तृतीय अधिकार में सम्यग्चारित्र का वर्णन करते हुए श्रावक के ५ अणुव्रत ३ गुणव्रत और ४ शिक्षाव्रत का वर्णन किया है। कषायरूप रागादि भाव का होना हिंसा एवं रागादिक भावों का नहीं होना अहिंसा है, इसका विवेचन किया है। विशेष बात हिंसा-अहिंसा के विषय में यह बताई है कि कोई जीव किसी को मारने का भाव बनाता है और वह उसे नहीं मार सका तो भी उसे हिंसा का पाप लग गया और कोई जीव देख-शोध कर कार्य कर रहा है लेकिन अनजाने में उससे हिंसा हो गई तो उसको हिंसा का उतना पाप नहीं लगेगा। आगे इसमें हिंस्य, हिंसक, हिंसा, हिंसा का फल इन्हें तजकर ५ उदुम्बर एवं मद्य, मांस, मधु को सर्वथा त्याग करने के लिए कहा है। हिंसा एवं अहिंसा के फल को आचार्य ने कितने सुन्दर ढंग से लिखा है-

हिंसा फलमपरस्य तु ददात्यिंहसा तु परिणामे।
इतरस्य पुनर्हिंसा दिशत्य हिंसाफलं नान्यत्।।५७।।

पद्यानुवाद-

वही अहिंसा अन्य किसी को, यथासमय हिंसा फल दे।
पुन: किसी को वह ही हिंसा, सही अहिंसा का फल दे।।
भावों का नाटक सब ही है, पुण्य-पाप का खेल अरे।
वैद्य डाक्टर आदिक सबको, फल भावों के रूप मिले।।५७।।

तृतीय अधिकार में श्रावक के १२ व्रतों का विस्तार से वर्णन करते हुए १६९ वें श्लोक में बताया है कि दाता को इह-परलोक की इच्छा रहित, निष्कपट, ईष्र्यारहित, सहनशीलता, क्षमा, हर्ष भाव, निरभिमानता इन सप्त गुणों सहित होना चाहिए।

चौथे अधिकार में सल्लेखना का वर्णन किया गया है। अच्छी तरह से कषाय एवं शरीर के त्याग करने को सल्लेखना कहते हैं। अथवा क्रम-क्रम से चतुर्विध आहार आदि को त्याग करके अंत समय तक णमोकारमंत्रपूर्वक शरीर व कषाय को कृष करते-करते इनका पूर्ण त्याग कर देना सल्लेखना है इसका दूसरा नाम संन्यासमरण और समाधिमरण है। सल्लेखना आत्मघात नहीं है, आत्मघाती कौन है? इसके लिए लिखा है-

जो नित कषायवश प्राणी, कुंभक शास्त्रादिक धारी।
निज प्राण हरे दुखकारी, हो आत्मघात सच भारी।।

सल्लेखना का वर्णन करके श्रावक के बारहव्रतों के अतिचारों का वर्णन किया है। अंत में अतिचारत्यागरूप का महान फल लिखा है-

जो इस प्रकार से पूर्व कहे, सब ही अतिचारों को नित ही।
अरु अतिक्रम व्यतिक्रम आदिक नित, अन्य कहें सब दूषण भी।।
झट विमर्श कर इन सबको तज, शुभ समकित व्रत शीलों द्वारा।
जब शीघ्रहि पुरुष प्रयोजन की, भवि निश्चित सिद्धि लहें न्यारा।।१९६।।

अंतिम पंचम अधिकार में सकल चारित्र का वर्णन करते हुए तप को भी मोक्ष का अंग कहा है। पूर्णरूप से तो तप आदि मुनिगण करते हैं पर श्रावक भी यथाशक्ति तप कर सकते हैं क्योंकि ‘इच्छानिरोधस्तप:’ इच्छाओं को कोई भी रोक सकता है। ६ बहिरंग तप-अनशन, अवमौदर्य, विविक्तशय्यासन, रसत्याग, कायक्लेश, वृत्तपरिसंख्या है और ६ अंतरंग तप-विनय वैय्यावृत्य, प्रायश्चित, उत्सर्ग, स्वाध्याय और ध्यान हैं पुन: समता, स्तवन, वंदना, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान, कायोत्सर्ग ये मुनियों के षट् आवश्यक, तीन गुप्ति, दशधर्म, बारह भावना, बाईस परीषह का क्रम-क्रम से स्पष्ट विवेचन किया है। आगे सकल रत्नत्रय व विकलरत्नत्रय दोनों को साक्षात् व परम्परा की अपेक्षा मुक्ति का कारण बताया है। रत्नत्रय में पुण्य का आश्रव होता है क्योंकि देव, शास्त्र, गुरु की सेवा, भक्ति, दान, शील उपवासादि ये सभी शुभोपयोगरूप हैं। २२५वें श्लोक में आचार्य ने अनेकांत धर्म को कितना सुन्दर दृष्टांत देकर सिद्ध किया है-

एकेनाकर्षन्ती श्लथपन्ती वस्तु तत्त्वमितरेण।
अन्तेन जयति जैनी नीतिर्मन्थाननेत्रमिव गोपी।।२२५।।

पद्यानुवाद-

ज्यों दही बिलोने ग्वालिन नित, ही सदा मथानी रस्सी को।
नित एक हाथ से खींच दूज, ढीले कर मक्खन सिद्ध करो।।
त्यों जैन नीति वस्तू स्वरूप को, इक समकित से खींच रही।
अरु द्वितिय ज्ञान कर शिथिल चरित, कर सिद्ध सदा जयवंत सही।।२२५।।

अंत में कहा है कि यह जैनियों की न्यायपद्धति, रत्नत्रयस्वरूप अनेकांत नीति हमेशा जयवंत हों .
आचार्यश्री अमृतचन्द्र सूरि ने प्रभावना अंग के लक्षण में लिखा है-

आत्मा प्रभावनीयो रत्नत्रयतेजसा सततमेव।
दानतपो जिनपूजा विद्यातिशयैश्च जिनधर्म:।।

इस गंथ के स्वाध्याय का सार यही है कि हमें अपनी आत्मा की सिद्धि के लिए, मोक्ष की प्राप्ति के लिए आचार्यों के द्वारा बताई गई बातों को ध्यान में रखते हुए आत्मा को परमात्मा बनाने का पुरुषार्थ करना चाहिए।

इस अप्रितम ग्रन्थ का स्वाध्याय आत्मा से परमात्मा बनने का मार्ग प्रशस्त होता हैं .धन्य हैं रचनाकार आचार्य अमृतचन्द्र जी.को बारम्बार नमन .

—–डॉक्टर अरविन्द जैन (Jain24.com)


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