चौबीस तीर्थंकरों के नामकरण के पीछे कारण


(1) श्री ऋषभनाथ जी :- प्रथम ऋषभ का स्वप्न और लान्छन देख कर ऋषभ नाम पड़ा।

(2) श्री अजीत नाथ जी :- चोपड़ पासे के खेल मे गर्भ के प्रभाव से राजा रानी की जीत होती गयी इस लीये अजीत नाम पड़ा I

(3) श्री संभवनाथ जी :- देश में धन धान्य का समुह में उत्पन्न हुआ देख कर संभव नाम पड़ा।

(4) श्री अभिनन्दननाथ जी :- गर्भ के समय इन्द्रों ने आकर बार बार अभिनन्दन किया इस लीये अभिनन्दन नाम पड़ा।

(5) श्री सुमतिनाथ जी :- राजक्रिया में कुछ कठिनाई आने पर रानी को कुछ सुमति सुझी इस लीये सुमति नाम पड़ा।

(6) श्री पद्मप्रभ जी :-पद्म कमल की सैया पर सोने का दोहद उत्पन्न हुआ और पद्म के समान शरीर देख कर पद्म नाम पड़ा।

(7) श्री सुपार्श्वनाथ जी :- रानी के स्पर्श से राजा की पसली्यां सीधी हो गयी इसलीये सुपार्श्व नाम पड़ा।

(8) श्री चन्द्रप्रभ जी :- चन्द्रमा खाने के दोहद से और चन्द्र के समान शरीर देख कर चन्द्रप्रभ नाम पड़ा।

(9) श्री पुष्पदन्त जी :- रानी को सुबुधि हुइ और पुष्प के समान दन्त देख कर सुविधिनाथ और पुष्पदन्त नाम पड़ा।

(10) श्री शीतलनाथ जी :- रानी के हाथ के स्पर्श से राजा का दाह्ज्वर रोग हटने से शीतलनाथ नाम पड़ा।

(11) श्री श्रेयांसनाथ जी :- बहुत लोगों का श्रेय करने से श्रेयांस नाम पड़ा।

(12) श्री वासुपुज्य जी :- वासुइन्द्र ने वासु द्रव्य की वृष्टी की इसलीये वासुपुज्य नाम पड़ा।

(13) श्री विमलनाथ जी :- गर्भ में आने पर माता की बुध्दि निर्मल होने से विमलनाथ नाम पड़ा।

(14) श्री अनन्तनाथ जी :- राजसिंहासन ने अनन्त बलशाली शत्रु की सेना को जीत लीया इसलीये अनन्तनाथ नाम पड़ा।

(15) श्री धर्मनाथ जी :- माता पिता को धर्म में दृढ प्रीति होने के कारण धर्मनाथ नाम पड़ा।

(16) श्री शान्तिनाथ जी :- देश में महामारी का उपद्रव शान्त होने के कारण शान्तिनाथ नाम पड़ा।

(17) श्री कुन्थुनाथ जी :- गर्भ में माता ने कुन्थु नाम का रत्नसंचय देखा इसलीये कुन्थु नाम पड़ा।

(18) श्री अरनाथ जी :- माता को गर्भ में रत्नमय आरा दिखा इसलीये अरनाथ नाम पड़ा।

(19) श्री मल्लिनाथ जी :- माता ने सभी रुथु की माला पहनी इसलीये मल्लिनाथ नाम पड़ा।

(20) श्री मुनिसुव्रत नाथ जी :- बहुत बोलनेवाली माता ने गर्भ में मौन रहने के कारण मुनिसुव्रत नाम पड़ा।

(21) श्री नमिनाथ जी :- सभी वैरीयों के नम्हे जाने नमिनाथ नाम पड़ा।

(22) श्री अरिष्टनेमिनाथ जी :- अरिष्ट रत्नों की निधि स्वप्न में देखने के कारण अरिष्टनेमि नाम पड़ा।

(23) श्री पार्श्वनाथ जी :- अन्धकार में सर्प को पास से जाते देख कर पार्श्व नाम पड़ा।

(24) श्री वर्धमान जी :- राज्य में धन धान्य की वृध्दि देख वर्धमान नाम पड़ा।

— S C Jain


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