अद्भुत जैन तीर्थ द्रोणगिरि ‘पार्श्वनाथ मंदिर’


मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले में विजावर तहसील में स्थित हैै। द्रोणगिरि क्षेत्र पर्वत पर है। वहाँ पहुँचने के लिए २३२ सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। सीढ़ियाँ पक्की बनी हुई हैं। पर्वत की तलहटी में सेंधपा नामक एक छोटा सा गाँव है। वहाँ पहुँचने के लिए मध्य रेलवे के सागर या हरपालपुर स्टेशन पर उतरना चाहिए। सुविधानुसार मऊ, महोबा या सतना भी उतर सकते हैं। प्रत्येक स्टेशन से क्षेत्र लगभग १०० कि.मी. पड़ता है। सभी स्थानों से पक्की सड़क गयी है।

कानपुर-सागर रोड अथवा छतरपुर-सागर रोड पर मलहरा ग्राम है। मलहरा से द्रोणगिरि ७ कि.मी. है। वहाँ तक पक्की सड़क है। सागर से मलहरा तक बसें चलती हैं। बस द्वारा मलहरा पहुँचकर वहाँ से नियमित बस द्वारा क्षेत्र तक जा सकते हैं। बस का टिकट सेंधपा के लिए लेना चाहिए। गाँव का नाम तो सेंधपा है, किन्तु पर्वत का नाम द्रोणगिरि है। सेंधपा के बस अड्डे से जैन धर्मशाला लगभग १०० गज दूर गाँव के भीतर है। वहीं गाँव का मंदिर और गुरुदत्त संस्कृत विद्यालय है। निर्वाण भूमि—द्रोणगिरि निर्वाण क्षेत्र है। प्राकृत निर्वाणकाण्ड में इस संबंध में निम्नलिखित उल्लेख मिलता है—
फलहोडी बड़गामे, पच्छिम भायम्मि दोणगिरि सिहरे।
                                    गुरुदत्तादि मुणिन्दा, णिव्वाण गया णमो तेसिं।।

अर्थात्, फलहोडी बडगाँव के पश्चिम में द्रोणगिरि पर्वत है। उसके शिखर में गुरुदत्त आदि मुनिराज निर्वाण को प्राप्त हुए। उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ।

संस्कृत निर्वाण भक्ति में केवल क्षेत्र का नाम द्रोणिमान् दिया हुआ है। उसका कोई परिचय अथवा वहाँ से मुक्त होने वाले मुनि का नाम नहीं दिया गया है।

निर्वाण काण्ड में द्रोणगिरि की पूर्व दिशा में जिस फलहोड़ी बड़गाँव का उल्लेख किया गया है, वह गाँव आजकल नहीं मिलता। वर्तमान द्रोणगिरि के निकट सेंधपा ग्राम है, जिसका कहीं कोई उल्लेख नहीं है। कल्पना की जाती है कि यहाँ प्राचीन काल में फलहोड़ी बड़गाँव रहा होगा और वह किसी कारणवश नष्ट हो गया होगा। वास्तव में सेंधपा गाँव विशेष प्राचीन प्रतीत नहीं होता। कहा तो यह जाता है कि जिस भूमि पर यह ग्राम बसा हुआ है, वह पहले निकटवर्ती ग्राम की श्मशान भूमि थी। इस गाँव के निकट किसी प्राचीन ग्राम के अवशेष प्राप्त होते हैं जो काफी बड़े क्षेत्र में फैले हुए हैं। पर्वत की तलहटी मेें इन्हीं अवशेषों के बीच एक भग्न प्राचीन जैन चैत्यालय अब भी खड़ा है, जिसे लोग बँगला कहते हैं। यदि यहाँ खुदाई की जाये तो यहाँ पर पुरातत्त्व की विपुल सामग्री मिलने की संभावना है।

निर्वाण काण्ड के उल्लेख से ज्ञात होता है कि यहाँ से न केवल गुरुदत्त मुनि ही मोक्ष पधारे हैं, अपितु अन्य मुनि भी मुक्त हुए हैं। भाषा कवियों ने इनकी संख्या साढ़े तीन कोटि दी है। वास्तव में तपोभूमि की उपयुक्त रमणीयता को देखते हुए प्राचीन काल में यहाँ तपस्या के लिए आना अधिक संभव था और अनेक मुनियों का यहाँ से निर्वाण प्राप्त करना असंभव नहीं था।

प्राचीन शास्त्रों में द्रोणगिरि का उल्लेख— निर्वाण काण्ड और निर्वाण भक्ति के अतिरिक्त द्रोणगिरि या द्रोणिमान् पर्वत का उल्लेख भगवती आराधना, आराधनासार, आराधना कथाकोष आदि ग्रंथों में आया है। भगवती आराधना में आचार्य शिवकोटि इस प्रकार वर्णन करते हैं—
                                      हत्थिणपुर गुरुदत्तो, संवलिथालीव दोणिमंत्तम्मि।
                                      उज्झंतो अधियासिय, पडिपण्णो उत्तमं अट्ठं।।१५५२।।

अर्थात्, हस्तिनापुर के निवासी गुरुदत्त मुनिराज द्रोणिमान् पर्वत के ऊपर सम्भलिथाली के समान जलते हुए उत्तम अर्थ को प्राप्त हुए। सम्भलिथाली का अर्थ है—एक बर्तन जिसमें घास-फूस भरा हो, उसका मुख नीचे की ओर हो और सूखे पत्तों आदि से ढँका हो तथा उसके चारों ओर अग्नि लगी हो। अग्नि लगने पर जिस प्रकार भीतर का घास-फूस जलने लगता है, उसी प्रकार द्रोणिमान् पर्वत के ऊपर गुरुदत्त मुनिराज भी जलकर मुक्त हुए।
इसी प्रकार आराधनासार ग्रंथ में इस घटना का उल्लेख इस प्रकार किया गया है—

                                         वास्तव्यो हास्तिने धीरो, द्रोणीमति महीधरे।
                                         गुरुदत्तो यति: स्वार्थं, जग्राहानलवेष्टित:।।

अर्थात् हस्तिनापुर के निवासी गुरुदत्त मुनि ने द्रोणिमान् पर्वत पर अग्नि लगने पर आत्मा के प्रयोजन (स्वार्थ) को सिद्ध किया।

द्रोणगिरि की तलहटी में सेंधपा गाँव बसा हुआ है। गाँव में एक जैन मंदिर है। यहीं जैन धर्मशालाएँ बनी हुई हैं। धर्मशाला से दक्षिण की ओर दो फर्लांग दूर पर्वत है। पर्वत के दायें और बायें बाजू से काठिन और श्यामली नदियाँ सदा प्रवाहित रहती हैं। ऐसा प्रतीत होता है, मानों ये सदानीरा पार्वत्य सरिताएँ इस सिद्धक्षेत्र के चरणों को पखार रही हों। पर्वत विशेष ऊँचा नहीं है। पर्वत पर जाने के लिए २३२ पक्की सीढ़ियाँ बनी हुई हैं।

चारों ओर वृक्षों और वनस्पतियों ने मिलकर क्षेत्र पर सौन्दर्य राशि बिखेर दी है। पर्वत के ऊपर कुल २८ जिनालय बने हुए हैं। इनमें तिगोड़ा वालों का मंदिर सबसे प्राचीन है। इसे ही बड़ा मंदिर कहा जाता है। इसमें भगवान आदिनाथ की एक सातिशय प्रतिमा संवत् १५४९ की विराजमान है। सम्मेदशिखर के समान यहाँ पर भी चन्द्रप्रभ टोंक, आदिनाथ टोंक, आदि टोंक हैं। यहाँ १३ फुट ऊँची एक प्रतिमा का भी निर्माण हुआ है। अंतिम मंदिर पार्श्वनाथ स्वामी का है। उसके नीचे ३ गज ऊँची, १ गज चौड़ी और ४-५ गज लम्बी एक गुफा बनी हुई है। इस गुफा के संबंध में विचित्र प्रकार की विविध किंवदन्तियाँ प्रचलित हैं।

एक किंवदन्ती यह है कि सेंधपा गाँव का रहने वाला एक भील प्रतिदिन इस गुफा में जाया करता था और वहाँ से कमल का एक सुन्दर फूल लाया करता था। उसका कहना था कि गुफा के अंत में दीवार में एक छोटा छिद्र है। उसमें हाथ डालकर वह फूल तोड़कर लाता था। उस छिद्र में दूसरी ओर एक विशाल जलाशय है। उसमें कमल खिले हुए हैं। वहाँ अलौकिक प्रभापुंज है। बिल्कुल इसी प्रकार की किंवदन्ती मांगीतुंगी क्षेत्र पर भी प्रचलित है। एक दूसरी किंवदन्ती है कि गुफा १४-१५ मील दूर भीमकुण्ड तक गयी है।

पर्वत की तलहटी से एक मील आगे जाने पर श्यामली नदी का भराव है, जिसे कुडी कहते हैं। वहाँ दो जलकुण्ड पास-पास में बने हुए हैं, जिनमें एक शीतल जल का है और दूसरा उष्ण जल का। यहाँ चारों ओर हर्र, बहेड़ा, आँवला आदि वनौषधियों का बाहुल्य है। यहाँ का प्राकृतिक दृश्य अत्यन्त आकर्षक है। इस वन में हरिण, नीलगाय आदि वन्य पशु निर्भयतापूर्वक विचरण करते हैं। कभी-कभी सिंह, तेंदुआ या रीछ भी इधर जल पीने आ जाते हैं। पर्वत पर अनेक जिनालय हैं जिसमें पार्श्वनाथ जिनालयों का यहाँ मुख्य रूप से वर्णन है—

मंदिर नं. ३— पार्श्वनाथ मंदिर-पाषाण की कृष्णवर्ण, २ फुट ७ इंच ऊँची, पद्मासन प्रतिमा। विक्रम संवत् १९१८ माघ सुदी ५ चन्द्रवार को प्रतिष्ठित। इस प्रतिमा के ऊपर सहस्र फणा वाले भगवान पार्श्वनाथ सुशोभित हैं।

मंदिर नं. ९— पार्श्वनाथ मंदिर-मूँगिया वर्ण, पद्मासन प्रतिमा, ३ फुट ३ इंच अवगाहना, वि.सं. १९०७ फागुन सुदी १० शुक्रवार को प्रतिष्ठित। सप्त फणवाली है।

मंदिर नं. १०— पार्श्वनाथ मंदिर-शुक्ल वर्ण, पद्मासन प्रतिमा, २ फुट ६ इंच अवगाहना। वि.सं. १९०७ फागुन वदी १० को प्रतिष्ठित। सप्त फणवाली है।

मंदिर नं. ११— पार्श्वनाथ मंदिर-प्रतिमा श्वेतवर्ण, पद्मासन, २ फुट ८ इंच अवगाहना। लेख नहीं है। नौ फणवाली है।

मंदिर नं. १५— पार्श्वनाथ मंदिर-श्वेतवर्ण, पद्मासन, १ फुट १० इंच उत्तुंग प्रतिमा। वि.सं. १५४५ में प्रतिष्ठित। दूसरी वेदी में भी पार्श्वनाथ हैं।

मंदिर नं. २२— पार्श्वनाथ मंदिर-कृष्णवर्ण, पद्मासन, १ फुट १ इंच अवगाहना वाली प्रतिमा। संवत् १९०१ माघ सुदी ५ सोमवार को प्रतिष्ठित। जटाएँ कन्धों पर लहरा रही हैं।

मंदिर नं. २७— पार्श्वनाथ मंदिर-श्वेतवर्ण, पद्मासन, १० इंच अवगाहना वाली प्रतिमा। सं. १५४८ में प्रतिष्ठित। मूर्ति पर फण नहीं हैं। सर्प लांछन है

मंदिर नं. २८—पार्श्वनाथ मंदिर के पास पर्वत पर जो गुफा है, उसके बायीं ओर संवत् १९९६ में एक कमरे में ३ हाथ ऊँची और ४ हाथ चौड़ी देशी पाषाण की वेदी पर गुरुदत्त मुनिराज के चरण विराजमान थे। वे अब वहाँं से उठाकर मूर्तियों के आगे रख दिये गये हैं। इस कमरे में दलीपुर और गोलगंज ग्रामों से लायी हुई कुछ प्राचीन मूर्तियाँ रखी हैं। इन मूर्तियों में मंदिर नं.२ की वह पार्श्वनाथ मूर्ति भी है, जिसे किसी अज्ञ ग्वाले ने लाठी से दायीं भुजा और कंधे को खंडित कर दिया था और मंदिर में इस मूर्ति के स्थान पर अन्य मूर्ति विराजमान कर दी थी। पार्श्वनाथ की यह मूर्ति कृष्णवर्ण, पद्मासन है और इसकी अवगाहना ३ फुट ७ इंच है।

निर्वाण गुफा—
अन्तिम पार्श्वनाथ मंदिर के नीचे एक प्राकृतिक गुफा है। वह विशेष लम्बी चौड़ी नहीं है। उसकी गहराई जानने का कोई साधन भी नहीं है। गुफा के बाह्य भाग में गुरुदत्तादि मुनियों के चरण-चिन्ह विराजमान हैं। विश्वास किया जाता है कि इसी गुफा में तपस्या करते हुए उन्हें मुक्ति प्राप्त हुई थी।

धर्मशालाएँ—
क्षेत्र पर कुल ३ धर्मशालाएँ हैं, जिनमें कुल ३ कमरे बने हुए हैं। क्षेत्र पर बिजली है तथा जल के लिए कुएँ हैं। क्षेत्र पर गद्दे, रजाइयाँ, बर्तन,चारपाई आदि की व्यवस्था है तथा क्षेत्र से आटा, दाल आदि खाद्य वस्तुएँ भी मिल सकती हैं।

वार्षिक मेला—
क्षेत्र पर प्रतिवर्ष फाल्गुन कृष्णा १ से ५ तक वार्षिक मेला होता है।

क्षेत्र व्यवस्था—
इस क्षेत्र की व्यवस्था निर्वाचित प्रबन्ध समिति करती है।क्षेत्र की सारी व्यवस्था के अतिरिक्त क्षेत्र पर स्थित श्री गुरुदत्त दिगम्बर जैन संस्कृत विद्यालय और मलहरा में स्थित जनता उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की व्यवस्था भी यही समिति करती है। इनके अतिरिक्त क्षेत्र पर अन्य जो भी संस्थाएँ हैं, उनका भी संचालन यही समिति करती है। यहाँ पर एक धार्मिक एवं प्रबंधन शिक्षण संस्थान भी संचालित किया जाता है, जिसमें प्रतिवर्ष कई विद्यार्थियों को नि:शुल्क धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ ऑफिस मैनेजमेंट एवं बहीखाते आदि की शिक्षा भी प्रदान की जाती है। विशेषरूप से यहाँ से अध्ययन प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को संस्थान द्वारा रोजगार दिलवाने का भी सफल प्रयास किया जाता है।

क्षेत्र पर शिकार-निषेध राजकीय आदेश—
विजावर नरेश राजा भानुप्रताप (रियासतों के विलीनीकरण से पूर्व) के समय से इस तीर्थ पर शिकार आदि खेलना राज्य की ओर से निषिद्ध है। इससे संबंधित फरमान, जो राज दरबार से जारी किया गया था, इस प्रकार है— ‘‘नकल हुकम दरवार विजावर इजलास जनाव येतमाहराम मुंशी शंकरदयाल साहब दीवान रियासत मुसवते दरख्वास्त जैन पंचान सभा सेंधपा जरिये दुलीचंद वैशाखिया अजना संरक्षक जैन सभा मारु जे २२ मई सन् १९३१ (ईसवीय दरख्वास्त फर्माये जाने हुक्म न खेलने शिकार क्षेत्र द्रोणगिरि वावै मौजा सेंधपा पर अनीज इसके कि विला इजाजत जैन सभा दीगर कौम के लोग क्षेत्र मजकूर पर न जा सके हुक्मी इजलास खास रकम जदे २५ मई सन् १९३१ ईसवीय ऐमाद कराये जाने मुश्तहरी कोई शख्स वगैर इजाजत जैन सभा पर्वत पर न जाये न शिकार खेले।

हुक्म हुआ जरिये परचा मुहकमा जंगल अ मुहकमा पुलिस के वास्ते तामील इत्तला दी जावे। तारीख २८ मई सन् १९३१ ई।’’
इस फरमान द्वारा द्रोणगिरि पर्वत पर जैन समाज का पूरा अधिकार माना गया है तथा जैन सभा की आज्ञा के बिना शिकार खेलने पर पाबन्दी लगा दी गयी है। यद्यपि रियासतों के समाप्त होने पर उनके कानून और आदेश भी समाप्त हो गये हैं किन्तु यह आदेश कानून के रूप में नहीं, परम्परा के रूप में अब भी प्रचलित और मान्य है.
इस प्रकार यह तीर्थ क्षेत्र अपने आप में दर्शनीय के साथ तपस्थली भी हैं .

— डॉक्टर अरविन्द जैन


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