‘चातुर्मास तप, संयम, साधना का मार्ग है’: साध्वी सुरंजनाश्री

बाड़मेर। चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान स्थानीय जैन न्याति नोहरा में साध्वी सुरंजना श्री ने धर्मसभा में कहा कि अब जागने का समय है चातुर्मास में दान, शील, तप, भाव की उच्च भावों से आराधना करें। प्रवचन में सैकड़ों की संख्या में भक्तगण रोज लाभान्वित हो रहे है। प्रवचन में आने वाले उन श्रावक-श्राविकाओं को चातुर्मास की जानकारी जीवन में उतार रखी हैं। इससे प्रतिदिन अपने धर्म के प्रति जिम्मेदारी निभा रहे हैं। साध्वी ने बताया चातुर्मास शुरू होते ही अठाई, ग्यारह, छ:, पांच और सात तेले की तपस्या हो चुकी हैं। सभी श्रावक-श्राविका धर्म के प्रति तपस्या करने में पीछे नहीं रह रहे है। साध्वी श्री ने कहा कि श्रद्धावान व्यक्ति हमेशा सफलता से शुरुआत करता है। श्रृद्धा हमारे जीवन का शृंगार है। जो व्यक्ति जितना श्रद्धावान होता है वह व्यक्ति उतना ही ज्यादा विनम्र होता है। वितराग भगवान की वाणी हमारे जीवन के अंदर एक नई चेतना का संचार करने वाली होती हैं।

गुरूवर्या ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा, जैन धर्म में चातुर्मास के 4 माह संतों के लिए तप, संयम, साधना एवं आत्मा का कल्याण करने का पर्व है। ग्वालियर में ज्ञान की गंगा का श्रावक, ध्यान, तपस्या कर लोगों को धर्म मार्ग की ओर प्रेरित करेंगे। चातुर्मास में संतों के प्रवचन से जैन समाज के व्यक्ति को समागम का मौका मिलता रहेगा। संतों की वाणी व्यक्ति के अंदर आत्मा शरीर कषाय, पापों को धोने का काम करेगा। चौमासे में संत व साधू ज्ञान की वर्षा से जनमानस के दिल दिमाग को स्वच्छ करते है।

जब तक अपनी इंद्रियों से परिचय नहीं करोगे तब तक उनके ग़ुलाम बने रहोगे।आंखे हमारे शरीर की दूरबीन है
ओर इस मुहं रूपी गैरेज को ऐसा न बनाए की वो हमारे लिए दुर्गति के द्वार न खोल दे। रसनेन्द्रिय के वसीभूत होकर पेय-अपेय भक्ष्य अभक्ष्य का सेवन कर लेते है। सज्जन, धर्मी, स्वाध्याय प्रेमी सभी की अपनी अपनी पहचान अलग-अलग होती है।ऊपर वाला मस्तिष्क नही होता तो हम और एकेन्द्रिय एक समान रह जाते है।एकेन्द्रिय जीव सबसे पहले भगवान को प्रिय बनकर चला गया ।चातुर्मास के चार माह में हमें व्रत, त्याग-तपश्चर्या, नियम, दान, आराधना करने से अपनी संपत्ति का शुद्धिकरण करना है। गलत वस्तु खाने से जीभ को कोई पीङा नहीँ होगी, पीड़ा होगी तो पेट को होगी। जीभ ने मांगा हमने दे दिया,पेट बीमार हो गया तो गये होस्पिटल एक बीमार तो दस परेशान । आज हम ईतने स्वार्थी बन गये है भगवान को पुजारियों के हवाले कर दिया है, मुनिराज या साधू-साध्वी भगवन्तों को मुनीम के भरोसे व उनके मिलने आने वाले मेहमानों को नोकरो के भरोसे कर दिया है। जब तक इन्द्रियों को नहीँ समझेंगे तब तक वो अपनी दादागिरी करती रहेगी। संसार त्याग करना तो सरल है लेकिन भीतर से संस्कार का त्याग करना कठीन है।

चातुर्मास समिति के मीडिया प्रभारी चंद्रप्रकाश बी. छाजेड़ व अनिल संखलेचा मारूड़ी ने बताया कि संघ पूजन का लाभ सोहनलाल छाजेड़ ने लिया।

चन्द्रप्रकाश बी.छाजेड़

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