भारत रत्न के असली हकदार हैंआचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज


वीतरागता से विभूषित दिगंबर जैन श्रमण संस्कृति के महामहिम, महाज्ञानी, निरभिमानी संत शिरोमणि आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज गांधीवादी विचारधारा से ओतप्रोत एक ऐसे आध्यात्मिक संत हैं जो पिछले पांच दशक से त्याग, तपस्या, ज्ञान, साधना, संयम, और अपनी करुणा से न केवल जैन क्षितिज को आलोकित कर रहे हैं वरन जिन शासन की ध्वजा का शीर्ष भी ऊंचा कर रहे हैं। आज आचार्य श्री धर्म और अध्यात्म के प्रभावी प्रवक्ता एवं जैन ही नहीं जन जन के महामहिम शिखर संत और श्रमण संस्कृति की उस परमोज्जवल धारा के अप्रतिम प्रतीक हैं जो आज भी सिंधु घाटी की प्राचीनतम सभ्यता के रूप में अक्षुण होकर समस्त विश्व को अपनी गौरव गाथा सुना रही है।

इस युग के लिए आचार्य श्री का जो अवदान है वह वर्णनातीत है। यहां यह उल्लेख करना अतिशयोक्ति पूर्ण नहीं होगा की आचार्य श्री की प्रेरणा,आशीर्वाद एवं जीव दया और लोक कल्याण की भावना से आज देश में सताधिक गोशालाऐं संचालित हो रही हैं वहीं, कई शहरों में स्त्री शिक्षा हेतु गुरुकुल पेटर्न पर प्रतिभास्थली (कन्या आवासीय विद्यालय) की स्थापना, आयुर्वेदिक एवं एलोपैथिक हॉस्पिटल एवं रिसर्च सेंटर की स्थापना, हथकरघा उद्योग, प्रशासकीय प्रशिक्षण संस्थान संचालित हो रहे हैं। प्राचीन जीर्ण शीर्ण एवं अव्यवस्थित तीर्थों और मंदिरों को सुदृढ़ एवं सुदर्शनीय स्वरूप देने के लिए भी उनका स्वर्ण अक्षरों में लिखे जाने योग्य महनीय योगदान है।

आचार्य श्री के व्यक्तित्व और कृतित्व को देखते हुए भारत सरकार द्वारा आचार्य श्री को भारत रत्न अलंकरण प्रदान किया जाना चाहिए, वह इस अलंकरण के असली हकदार हैं। हालांकि आचार्य श्री किसी अलंकरण के मोहताज नहीं हैं और ना ही उन्हें इसकी वांछा है न आकांक्षा है लेकिन उन्हें भारत रत्न अलंकरण इसलिए प्रदान किया जाना चाहिए कि आचार्य श्री का सर्व हितेषी कार्यों के रूप में जो अवदान है।

उसके प्रति भारत सरकार द्वारा कृतज्ञता की भावना से आचार्य श्री को भारत रत्न अलंकरण प्रदान किया जाना चाहिए। इससे जैन शासन का गौरव तो बढ़ेगा और जैन धर्म को नई पहचान मिलेगी यदि ऐसा होता है तो यह इस बात का प्रमाण भी बनेगा कि भारत सरकार ने आचार्य श्री को एक महान विभूति के रुप में स्वीकार किया है।
आचार्य श्री के दीक्षा दिवस पर हम उनके रत्नत्रय के कुशल मंगल की कामना करते हुए तीर्थंकर सम उपकारी आचार्यश्री को त्रिवार नमोस्तु करते हैं

— डॉक्टर जैनेंद्र जैन


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