पर्युषण पर्व हमें अपने प्रायश्चित दूर करने का अवसर देता है


जैन धर्म दुनिया के ब्यापकतम धर्म सहित अतिप्राचीन किंतु वैज्ञानिक सिद्धातों पर खड़े धर्मो में से एक है और अपने सिद्धातों में तमाम अच्छाइयों को समेटे हुए है। जैन धर्म में मूलत: अपनी अंतरआत्मा को पवित्र, शुद्ध और पावन करने पर विशेष जोर दिया गया है। ऐसा ही वर्ष में एक बार आने वाला महान पर्व ‘पर्युषण पर्व’ है, जिसमें केवल और केवल, दिन-प्रति-दिन व्यक्ति की कलुषित आत्मा को क्रमश: एक-एक सिद्धांत का आत्मसात कर कलुषित आत्मा को शुद्ध करने का महापर्व है।

भाद्रपक्ष शुक्ल पक्ष पंचमी से शुरू होकर चौदस तक चलने वाले 10दिनी पर्युषण पर्व में पहले दिन से लेकर दस दिनों तक क्रमश: उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आजर्व, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य, उत्तम ब्रहमचर्य जैसे महाव्रतों के सिद्धातों की पालना की जाती है। वैसे तो पर्युषण पर्व जैन धर्म के अनुयायी मनाते हैं किंतु यह हर उस व्यक्ति का पर्व है, जो अपनी अंतरआत्मा को दोषों से रहित कर पावन और शुद्ध बनाना चाहता है ताकि उसका सम्पूर्ण जीवन शांतिमय और सुखों से परिपूर्ण हो।

10दिनी पर्युषण पर्व में विशेष आराधना में लीन हो जाने के कारण इन दिनों की हुई विशेष आराधनाओं से जिन कर्मों का क्षय होता है, वह अन्य दिनों में नहीं हो पाता क्योंकि इस समय सम्पूर्ण समाज में उमंग, उल्लास और उत्साह की अनुभूति होती है, जिसमें की गई पवित्र साधनायें, व्रत, तप आदि उमंग से किये जाते हैं। ऐसा माहौल अन्य दिनों में नहीं मिलता। यही कारण है कि पर्युषण पर्व की अपनी विशेष महत्ता है। ये पर्व जीव को भविष्य में दुगर्ति एवं वर्तमान में दुर्भाव से दूर रखता है। उसकी आत्मा धर्म की प्रभावना से उमंगित और उल्लासित हो उठती है, जो व्यक्ति को अहंकार और ईष्र्या से मुक्त करती है।

आज के भौतिकतावादी युग में स्वयं को दूसरों से ऊपर रखने और जल्दी करोड़पति बनने की होड़ में वगैर बिना देखे, एक-दूसरे के मान-सम्मान और उनकी बिना कद्र किये अपने सहज स्वभाव को ताक पर रखकर अंधी दौड़ में दौड़े चले जा रहे हैं। राग-विराग और द्वेष से भरे संसार में अपने हितों और झूठे अहंकार की गठरी लिये हम न जाने किस-किस से टकराते फिरते हैं। कभी स्वयं और कभी दूसरों की भावनाओं को ताक पर रखकर आगे निकलने की होड़ में हम अनजाने में किसी न किसी रूप में अहिंसक होते चले जाते हैं। इसी आपाधापी के बीच पर्युषण पर्व आपसी रस्साकसी और भागमभागी की दौड़ में स्वयं को परखने का एक मौका देता है।

आगे निकलने की होड़ से उपजी ग्लानि, क्षोभ और दूसरों की भावनाओं का अनदेखा करने जैसी भूलों को धोने का यह 10दिनी पर्युषण पर्व हमें अवसर प्रदान करता है। अत: हमें जैन धर्म के 10 सिद्धातों को आत्मसात करें और शुद्धअंत: करण से हम अपनी भूल-चूक स्वीकार करें और प्राणी मात्र के प्रति विनम्रता का भाव जगायें। ऐसा तभी संभव है जब हमारा व्यक्तित्व और अधिक सहिष्णु बनकर उभरे। हमारे प्राश्चित और हमारे द्वारा की गई भूलों सहित हमारे विकार, इस पावन पर्युषण पर्व की आराधना, व्रत की आंच में चल उठें और आत्मा अपने वास्तविक रूप को पाकर खिल उठे।

  • निशेष जैन

Comments

comments