गुणायतन: जैन दर्शन का अद्वितीय स्थल—मुनिवर प्रमाण सागर जी महाराज की दूर दृष्टि


आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज के प्रभावक शिष्य मुनि श्री १०८ प्रमाणसागर जी महाराज की परिकल्पना विश्व की अद्वितीय नमूना का निर्माण किया जा रहा हैं जो अंतिम चरण में हैं और निकट भविष्य में विशाल आयोजन के साथ शुभारम्भ होगा जिसका पूरे विश्व को बेताबी से इंतज़ार कर रहे हैं ।

जैन दर्शन के अनुसार आत्मा ही परमात्मा है । प्रत्येक आत्मा अनन्त शक्तियों का पिण्ड है । किसी आत्मा में आत्म शक्तियां पूर्ण प्रकट होती है तो किसी में कम | जैसे काली अंधियारी सघन घटाएँ सूर्य के प्रकाश को मंद कर देती है । जैसे काली अंधियारी सघन घटाएँ सूर्य के प्रकाश को मंद कर देती है।

गुणों का आयतन- आयतन यानी ऐसा धर्म क्षेत्र जहांँ आने से आपके गुणों का विकास होता है। … इसलिए इसका नाम गुणायतन, जो गुणों का आयतन, गुणात्मक विकास करने वाला आयतन।गुणों का आयतन- आयतन यानी ऐसा धर्म क्षेत्र जहांँ आने से आपके गुणों का विकास होता है। विकास करना चाहते हो? अपने अन्दर अच्छे गुण बनाना चाहते हो, अपने गुणों को ऊँचा उठाना चाहते हो, तो वह सब चीजें गुणायतन में दिखेंगी।

गुणस्थान’ जैन धर्म का एक वैशिष्ट शब्द है. जैन साधना पद्धति में आत्मा के क्रमिक विकास के सोपानों को गुणस्थान कहा जाता है। इन्हीं गुणस्थानों को साकार करने का अद्भुत प्रयास है- ‘गुणायतन’। ‘गुणायतन’ मुनिश्री के प्रौढ़ चिन्तन और परिपक्व परिकल्पना का जीवन्त प्रमाण है। जैन धर्मावलम्बियों के शिरोमणि तीर्थस्थल श्रीसम्मेद शिखर जी की तलहटी में निर्माणाधीन यह एक ऐसा उपक्रम है, जिसके माध्यम से पोथियों की बातों को पल में जाना जा सके। गुणायतन एक ऐसा ज्ञानमन्दिर बनने जा रहा है, जो जैन सिद्धान्तों की प्रयोगशाला बनकर मानवमात्र के आत्मविकास का दिव्य द्वार सिद्ध होगा। यहाँ आकर मानव अपने जीवन के मर्म को जान सकेगा। जैन सिद्धान्तों के विविध पक्षों को आधुनिकतम तकनीक के साथ एनिमेशन होलोग्राम के माध्यम से शब्द, संगीत और प्रकाश के साथ 9डी और 270डिग्री के स्क्रीन पर दिखाया जाएगा। इसप्रकार गुणायतन वास्तव में आत्मिक गुणों का दिग्दर्शन कराने वाला गुणगर्भित स्थान होगा।

गुणायतन एक ऐसा मन्दिर बन रहा है, मन्दिर के साथ एक ऐसा ज्ञान मन्दिर बन रहा है, जिसके माध्यम से आत्मा से परमात्मा तक की सम्पूर्ण जीवन यात्रा की जीवन्त झाँकी बनाई जायेगी। जिसमें देखेंगे कि  मिथ्या दृष्टि व सम्यक दृष्टि धर्म का प्रभाव क्या होता है, एक श्रावक क्या होता है, मुनिराज क्या होते हैं, क्या होता है ध्यान, कैसे होती है कर्मों की निर्जरा, क्या होता है केवल ज्ञान, कैसा होता है भगवान का समवसरण, कैसे खिरती है उनकी दिव्य ध्वनी,  कैसा हाेता है भगवान का विहार, कैसा होता है उनका मोक्ष गमन, यह सब चीजें अपनी आँखों से देखोगे और देख करके ऐसी जो एडवांस टेक्नोलॉजी के माध्यम से आज दिखाई जायेगी। रोबोट्रिक्स, एनिमेट्रॉनिक, एनीमेशन, लेजर, साउंड इफैक्ट्स आदि जितनी भी आज की एडवांस टेक्नोलॉजी है, उसका इस्तेमाल किया जायेगा और लोगों को वह सब कुछ साक्षात जैसा महसूस होगा और ऐसा लगेगा कि मेरे सामने-सामने भगवान विराजमान हैं, भगवान मेरे सामने से विहार कर रहे हैं और जब तुम लोग यहाँ आओगे तुम्हारी खूब भाव-विशुद्धि बढ़ेगी और धर्म की सच्ची श्रद्धा जग जाने से तुम्हारे गुणों का विकास होगा। इसलिए इसका नाम गुणायतन, जो गुणों  का आयतन, गुणात्मक विकास करने वाला आयतन।

जैन दर्शन में आत्मशक्तियों के विकास अथवा आत्मा से परमात्मा बनने की शिखर यात्रा के क्रमिक सोपानों को चौदह गुणस्थानों द्वारा बहुत सुंदर ढंग से विवेचित किया गया है. जैन दर्शन में जीव के आवेगों-संवेगों और मन-वचन-काय की प्रवत्तियों के निमित्त से अन्तरंग भावों में होने वाले उतार-चढ़ाव को गुणस्थानों द्वारा बताया जाता है. गुणस्थान जीव के भावों को मापने का पैमाना है. परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद एवं परम पूज्य मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज की मंगल प्रेरणा से मधुबन, सम्मेदशिखरजी में निर्मित होने जा रहे, धर्मायतन “गुणायतन” में इन्हीं चौदह गुणस्थानों को “दृष्य-श्राव्य-रोबोटिक्स प्रस्तुति” के माध्यम से दर्शनार्थियों को समझाया जायेगा. निर्माणाधीन जिनालय, जैन स्थापत्य और कला के उत्कृष्ट उदाहरण होंगे.

जैन दर्शन में आत्मशक्तियों के विकास अथवा आत्मा से परमात्मा बनने की शिखर यात्रा के क्रमिक सोपानों को चौदह गुणस्थानों द्वारा बहुत सुंदर ढंग से विवेचित किया गया है. जैन दर्शन में जीव के आवेगों-संवेगों और मन-वचन-काय की प्रवत्तियों के निमित्त से अन्तरंग भावों में होने वाले उतार-चढ़ाव को गुणस्थानों द्वारा बताया जाता है. गुणस्थान जीव के भावों को मापने का पैमाना है. परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद एवं परम पूज्य मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज की मंगल प्रेरणा से मधुबन, सम्मेदशिखरजी में निर्मित होने जा रहे, धर्मायतन “गुणायतन” में इन्हीं चौदह गुणस्थानों को “दृष्य-श्राव्य-रोबोटिक्स प्रस्तुति” के माध्यम से दर्शनार्थियों को समझाया जायेगा. निर्माणाधीन जिनालय, जैन स्थापत्य और कला के उत्कृष्ट उदाहरण होंगे.

गुणस्थान चौदह होते हैं
१ – मिथ्यात्व गुणस्थान
२ – सासादन गुणस्थान
३ – सम्यक् मिथ्यात्व गुणस्थान
४ – अविरत सम्यग्दृष्टि गुणस्थान
५ – संयतसांयत गुणस्थान
६ – प्रमत्त गुणस्थान
७ – अप्रमत्त संयत गुणस्थान
८ – अपूर्वकरण गुणस्थान
९ – अनिवृत्तिकरण गुणस्थान
१० – सूक्ष्म साम्प्राय गुणस्थान
११ – उपशांत मोह गुणस्थान
१२ – क्षीण मोह गुणस्थान
१३ – सयोग केवली गुणस्थान
१४ – आयोग केवली गुणस्थान

इसमें आरोहण(नीचे से ऊपर) और अवरोहण(ऊपर से नीचे) दोनों होते हैं …
ऐसे तो असंख्यात गुणस्थान होते हैं, क्यूंकि आत्मा के गुणों कि अवस्था भी असंख्यात हैं, किन्तु प्रयोजन भूत करने के लिए चौदह गुणस्थान प्रमुख बतलाये हैं !

तीर्थराज सम्मेद शिखर जैनियों का शिरोमणि तीर्थ है । यहाँ प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु/पर्यटक आते हैं । इतने बड़े तीर्थस्थल पर दिगम्बर जैन समाज का मंदिरों के अतिरिक्त ऐसा कुछ भी नहीं है जो यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं/पर्यटकों को आकर्षित कर उन्हें जैन धर्म का बोध करा सके ।

जैन दर्शन के इन्हीं चौदह गणस्थानों को सुन्दर/आकर्षक ढंग से प्रस्तुत करने के लिए हम एक विशिष्ट योजना को मूर्त रूप देने जा रहे हैं । यह योजना एक अभिनव योजना है । गुणायतन के नाम से बनने जा रहा यह धर्मायतन जैन धर्म के परम्परागत मंदिरों/धर्मायतनों से एकदम अलग एक अद्भुत ज्ञानमंदिर होगा ।
 

  — वैद्य अरविन्द प्रेमचंद जैन


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