लौकिक सुख के लिए नहीं बल्कि मोक्ष प्राप्ति का पर्व पर्युषण: आचार्य श्री निर्भय सागर जी


दमोह। आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज ने कहा रागी के राग को वीतरागी हटा सकता है रागी नही। मोही  के मोह को निर्मोही कम कर सकता है, मोही नही। सन्त वही है जो राग मोह से मुक्त हो। तीर्थकर हित का उपदेश देकर धर्म तीर्थ का संचालन करते है तीर्थकर कहलाते है।

धर्म का समूह लड़ने से नही लाड़ करने से है, धर्म का संबंध ईर्ष्या से नही ईश्वर से होता है, धर्म का संबंध वासना से नही उपासना से होता है। भारत देश मे अधिक  अस्तिक्य लोग मिलेगे उतने अन्य देशों में नही। इस आस्था का परिणाम ही है की हमारी सरलता सहजता विश्वास का लोगो ने गलत उपयोग किया और विश्वास मे लेकर देश पर अधिकार जमाया। आपस मे लडाया वह लडाई एक  दूसरों को नीचा गिराने और अधिकार जमाने के लिए होने लगी है। धर्म लड़ने के लिए नही होता बल्कि लड़ाई झगड़े को छोडकर परमात्मा जैसे विशाल ज्ञान संयम अपनत्व और सुख पाने के लिए होता है।

आचार्य ने कहा पर्युषण पर्व जियो और जीनों दो के लिए आ रहा है पर्युषण पर्व का मूल उद्देश्य आत्मा को परमात्मा बनाना होता है।  इसके लिए हमे क्षमा सरलता निर्लोपता सत्य संयम तप हिंसा आदि पाप के त्याग परिग्रह हिंसा मूर्छा छोड़कर ब्रह्म स्वरूप आत्मा का ध्यान करना अनिवार्य है उन्होंने कहा जो व्रत संयम लेकर त्याग तपस्या को अपनाता है उसकी शक्ति उद्घाटित हो जाती है।

 

       — अभिषेक जैन लुहाडीयारामगंजमंडी


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