तीर्थंकर ऋषभदेव की शिक्षाएं आज अधिक प्रासंगिक – ऋषभदेव निर्वाणोत्सव के अवसर पर विशेष आलेख-


जैन परम्परा में मान्य चौबीस तीर्थंकरों की श्रृखंला में भगवान ऋषभदेव जैनधर्म के प्रवर्तक है। उनका जन्म चैत्र कृष्णा नवमी को अयोध्या के महाराजा नाभिराय तथा महारानी मरूदेवी के यहां हुआ था, माघ कृष्णा चतुर्दशी को इनका निर्वाण कैलाश पर्वत पर हुआ। इन्हें आदिनाथ, बड़ेबाबा, आदिदेव आदि अनेक नामों से जाना जाता है।

विश्व के प्राचीनतम लिपिबद्ध धर्म ग्रंथों में से एक वेद में तथा श्रीमद्भागवत इत्यादि में आये भगवान ऋषभदेव के उल्लेख तथा विश्व की लगभग समस्त संस्कृतियों में ऋषभदेव की किसी न किसी रूप में उपस्थिति जैनधर्म की प्राचीनता और भगवान ऋषभदेव की सर्वमान्य स्थिति को व्यक्त करती है। उन्होंने मानव जाति को पुरूषार्थ का उपदेश दिया। अपने जीवन निर्माण के लिए, परिवार, राष्ट् के लिए उन्होंने कर्म का उपदेश दिया। यह गौरव की बात है कि इन्हीं प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र भरत के नाम से इस देश का नामकरण ‘भारतवर्ष’ इन्हीं की प्रसिद्धि के कारण विख्यात हुआ।

उन्होंने कर्मों पर विजय प्राप्त कर दुनिया को त्याग का मार्ग बताया। भगवान ऋषभदेव की शिक्षाएं मानवता के कल्याण के लिए हैं, उनके उपदेश आज भी समाज के विघटन, शोषण, साम्प्रदायिक विद्वेष एवं पर्यावरण प्रदूषण को रोकने में सक्षम एवं प्रासंगिक हैं। ऋषभदेव ने महिला साक्षरता तथा स्त्री समानता पर भी महत्वपूर्ण कार्य किया है। अपनी दोनों पुत्रियों को ब्राह्मी को अक्षर ज्ञान के साथ साथ व्याकरण, छंद, अलंकार, रूपक, उपमा आदि के साथ स्त्रियोचित अनेक गुणों के ज्ञान से अलंकृत किया। दूसरी पुत्री सुंदरी को अंकगणतीय ज्ञान से पुरस्कृत किया। आज भी उनके द्वार निर्मित व्याकरणशास्त्र तथा गणितिय सिद्धांतो ने महानतम ग्रंथों में स्थान प्राप्त किया है।

प्रशासनिक कार्य में इस भारत भूमि को उन्होंने राज्य, नगर, खेट, कर्वट, मटम्ब, द्रोण मुख तथा संवाहन में विभाजित कर सुयोग्य प्रशासनिक, न्यायिक अधिकारों से युक्त राजा, माण्डलिक, किलेदार, नगर प्रमुख आदि के सुर्पुद किया। आपने आदर्श दण्ड संहिता का भी प्रावधान कुशलता पूर्वक किया। डॉ एन एन बसु ने सिद्ध किया है कि  लेखन कला और ब्राह्म लिपी के जनक ऋषभदेव हैं। गांधीवादी चिंतक काका कालेकर का यह निष्कर्ष उचित ही है-‘‘हिन्दू समाज को संस्कारी औ सभ्य बनाने में ऋषभदेव का बड़ा हाथ है। कहा जाता है कि विवाह व्यवस्था, पाक शास्त्र, गणित , लेखन आदि संस्कृति के बीज ऋषभदेव ने समाज में बोए। अगर कहें तो भी चलेगा कि यह सब करके और अंत में उसका त्याग करके उन्होंने प्रवृत्ति और निर्वत्ति दोनों मार्गों का आचरण करके दिखाया।’’ ऋषभदेव ने कहा कि कृषि करो या ऋषि बनो।

ऋषभदेव का विस्तृत वर्णन श्रमण एवं वैदिक वांड्मय में तो हुआ ही है, कला में भी उनका उल्लेख प्राचीनकाल से होता आया है। ऋषभदेव की प्राचीनतम प्रतिमाएं कुषाणकाल और चौसा से मिली हैं। हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो की खुदाई से प्राप्त मूर्तियों को पुरातत्व विभाग ने ऋषभदेव की मूर्ति बताया है। ऋषभदेव की सर्वाधिक मूर्तियां उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश में उत्कीर्ण हुयी हैं। मुख्यरूप से मथुरा, कुंडलपुर, अयोध्या, नवागढ़, लखनउ, ग्वालियर, खजुराहो, गोलाकोट आदि की उल्लेखनीय हैं। बिहार, उड़ीसा और बंगाल में भी अनेक महत्वपूर्ण प्राचीन प्रतिमाएं  प्राप्त होती हैं। जैन भक्ति साहित्य में भगवाना ऋषभदेव की भक्ति सर्वप्रथम की जाती है। उनकी भक्ति में स्वतंत्र रूप से काव्य, पुराण, स्तोत्र, पूजाएं आदि बड़ी मात्रा में लिखे गए हैं। सातवीं शताब्दी में मुनिराज मानतुंग आचार्य ने भक्तामर स्तोत्र द्वारा संस्कृत में महान महत्वशील स्तवन भक्ति की है, आज जन-जन का कंण्ठाहार बना हुआ है।

ऋषभदेव ने एक ऐसी समाज व्यवस्था दी जो अपने आप में परिपूर्ण तो थी ही साथ ही उसकी पृष्ठ भूमि में अध्यात्म पर आधारित नैतिकता की नींव भी थी।

भारतीय संस्कृति के प्रणेता एवं जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की जनकल्याणकारी शिक्षा द्वारा प्रतिपादित जीवन-शैली, आज के चुनौती भरे माहौल में उनके सामाजिक एवं राजनीतिक विचारों की प्रासंगिकता है।

सामाजिक संरचना में उन्होंने प्रजाजनों केा तीन श्रेणियों में विभाजित करते हुए उनको अपने अपने कर्त्तव्य, अधिकार तथा उपलब्धियों के बारे में प्रथम मार्गदर्शन किया। सर्वांगीण विकास के मूल आधारभूत तत्वों का विवेचन कर वास्तविक समाजवादी व्यवस्था का बोध कराया। प्रत्येक वर्ण व्यवस्था में पूर्ण सामंजस्य निर्मित करने हेतु तथा उनके निर्वाह के लिए आवश्यक मार्गदर्शक सिद्धांत, प्रतिपादन करते हुए स्वयं उसका प्रयोग या निर्माण करके प्रात्याक्षिक भी किया। अश्व परीक्षा, आयुध निर्माण, रत्न परीक्षा, पशु पालन आदि बहत्तर कलाओं का ज्ञान प्रदर्शित किया । उनके द्वारा प्रदत्त शिक्षाओं का वर्गीकरण कुछ इस प्रकार से किया जा सकता है-असि-शस्त्र विद्या, 2. मसि-पशुपालन, 3. कृषि- खेती, वृक्ष, लता वेली, आयुर्वेद, 4.विद्या- पढना, लिखना, 5. वाणिज्य- व्यापार, वाणिज्य, 6.शिल्प- सभी प्रकार के कलाकारी कार्य।

आज मानवता के सम्मुख भौतिकवादी चुनौतियों के कारण नाना प्रकार के सामाजिक एवं मानसिक तनाव तथा संकट व्यक्तिगत, सामाजिक एवं भूमण्डल स्तर पर दृष्टिगोचर हो रहे हैं। भगवान ऋषभदेव द्वारा बताई गई जीवन शैली की हमारी सामाजिक एवं राजनैतिक व्यवस्था में काफी प्रासंगिकता एवं महत्ता है। उनके द्वारा प्रतिपादित ज्ञान-विज्ञान की विभिन्न क्षेत्रों में ऐसी झलकियां मिलती हैं जिन्हें रेखांकित करके हम अपने सामाजिक एवं राजनैतिक जीवन की गुणवत्ता को बढ़ा सकते हैं।

जैन समुदाय अपने प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के  निर्वाण महोत्सव को बड़े ही धूमधाम से श्रद्धा-भक्ति के साथ मनाता है। इस दिन पूरे देश में उनकी विशेष अभिषेक-शांतिधारा, पूजा-विधान कर उनके चरणों में निर्वाण लाडू समर्पित करते हैं।

-डॉ0 सुनील जैन संचय

 

 

 


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