व्यवसाय, गाड़ी, बंगला, 5 करोड़ को ठुकरा, बनी जैन साध्वी


इंदौर की उच्च शिक्षित एवं कॉस्मेटिक व्यवसाय करने वाली एक जैन युवती ने आत्म कल्याण एवं जैन धर्म की प्रभावना के लिए सब कुछ छोड़ साध्वी बनने का फैसला कर लिया। दीक्षा से पूर्व वह हिंदुस्तान लीवर में सेल्स विभाग में ऊंचे पद पर कार्य किया इसके बाद उन्होंने अपना कॉस्मेटिक व्यवसाय शुरू किया, जिसका सालाना टर्न ओवर 70 लाख था। जानकारी के अनुसार उनके नाना को जब पता चला कि उनकी नातिन दीक्षा ले रही है तो उनका दिल पिघल गया और उन्होंने अपना बंगला, गाड़ी सहित नगद 5 करोड़ रुपये उसे देने की पेशकश की और कहा कि तुम दीक्षा मत लो। यदि तुम्हारी धर्म प्रभावना है तो गृहस्थ जीवन में रहकर करती रहो किंतु नातिन अपनी दृढ़ निश्चय के आगे नहीं झुकी।

15 वर्ष पूर्व अहमदाबाद में साध्वी प्रशामिताश्री जी से दीक्षा लेकर वे साध्वी जिनप्रज्ञाश्री जी बन गई और अब नगर-नगर, गांव-गांव जाकर जैन धर्म की प्रभावना को जन-जन तक पहुंचा रही हैं। साध्वी जिनप्रज्ञाश्री जी के अनुसार बचपन से वे स्वतंत्र और खुले विचारों की रही हैं। उन्होंने बताया कि गुरू के एक सवाल ने मुझे दीक्षा लेने पर मजबूर कर दिया। गुरू ने कहा तुम स्वतंत्र रहना चाहती हो  किंतु तुम्हारी हर खुशी धन से जुड़ी है और तुम धन और सिर्फ धन पर ही निर्भर हो गई हो। इसके बाद मेरा आत्मबोध जागा और मैंने उसी समय दीक्षा लेने का प्रण कर लिया।

साध्वी जिनप्रज्ञाश्री ने 25 पुस्तकें लिखी हैं। उन्हें 9 भाषाओं की जानकारी है। इसके अलावा 11 वर्ष की अवस्था में सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड से सम्मानित हो चुकी हैं। साध्वी जिनप्रज्ञाश्री नृसिंह वाटिका में चातुर्मास कर रही हैं। ऐसे बिरले लोग होते हैं, धन-धान्य से पूर्ण जिंदगी, उच्च शिक्षित, लाखों-करोड़ों का व्यवसाय, कई भाषाओं की जानकारी होने के बाद भी वे एक क्षण में सब कुछ छोड़ अपने सांसारिक जीवन को त्याग वैराग्य की ओर चल पड़ते हैं।


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