आज दशलक्षण धर्म का छटवाँ दिन है- उत्तम संयम धर्मांग

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संयम का शाब्दिक अर्थ सम् + यम = संयम अर्थात् सम्यक रूप से यम अर्थात् नियंत्रण करना संयम है। हम कह सकते हैं जैसे बिना ब्रेक के गाड़ी बेकार है ठीक उसी प्रकार बिना संयम के अमूल्य मनुष्य भव बेकार है। इसीलिये आगम में संयम का पालन मुनिराज और श्रावक दोनों के लिये वर्णित है।

निश्चय से तो रागादि विकारों में प्रवृत्ति पर नियंत्रण रखना ही सच्चा संयम है। और व्यवहार से पंचइन्द्रियों के विषयों में प्रवर्तन पर नियंत्रण रखना और षट्काय के जीवों की रक्षा करना ही संयम है।

संयम के दो भेद है–

१- इन्द्रिय संयम

२- प्राणी संयम

१- इन्द्रिय संयम —

स्पर्शन, रसना , घ्राण , चक्षु और कर्ण इन पाँचों इन्द्रियों के 27 विषयों ( स्पर्शन के 8, रसना के 5, घ्राण के 2 ,चक्षु के 5 , और कर्ण के 7 ) में प्रवर्तन पर नियंत्रण रखना इन्द्रिय संयम है।

क्यों कि पंचइन्द्रियों के विषयों का सेवन हम सुख की वांछा से करते हैं , पर विचार करें कि क्या हमें उनके सेवन से सुख मिलता है ? नहीं !! भ्रम से सुख का आभाष मात्र होता है , वो भी कुछ ही क्षणों के लिये। वास्तव में *विषयों का सुख किंपाक फल के समान है , जो जीभ पर रखने पर तो मीठा लगता है , पर बाद में घोर दुख , महादाह , और संताप देकर मरण को प्राप्त कराता है , ठीक उसी प्रकार ये पंचेन्द्रिय के विषय जीव को बहुत आकर्षित करते है, लुभावने और मनमोहक लगते हैं , पर इनके फल में जीव अनंतकाल तक नरकों के घोर दुखों को सहन करता है।

जब एक – एक इंद्रिय के विषय में फँसकर क्रमशः हाथी (स्पर्शन) , मछली ( रसना)  , भौंरा (घ्राण) , पतंगा (चक्षु ) और हिरण ( कर्ण) आदि जानवर अपनी जान गँवा देते हैं , तो विचार करो हम तो एक – दो नहीं पाँच-पाँच इन्द्रियों के गुलाम हैं तो हमारी क्या दशा होगी ? सोचकर भी मन काँप उठता है।

इसलिये आचार्य भगवन कहते हैं —  “हे जीव! तू संयम का पालन कर !”

२- प्राणी संयम —

निगोदिया जीव से लेकर पंचेन्द्रिय तक के समस्त जीवों की रक्षा करना प्राणी संयम है।

हम अपने क्षुद्र स्वार्थों को पूरा करने के लिये न जाने कितने जीवों की हिंसा प्रतिदिन करते हैं। जैसे अभक्ष्य भक्षण , रात्रि भोजन , सौन्दर्य के सामान आदि के लिये हम अनंत जीवों की हिंसा करते हैं। यदि हम चाहे तो इन इच्छाओं पर नियंत्रण करके आंशिक रूप से ही सही जीव दया का पालन कर संयम की रक्षा कर सकते हैं। जो एक सच्चे श्रावक को करना ही चाहिये।

संयम की दुर्लभता —

चारों गतियों में से नरक , तिर्यंच और देवगति में तो संयम होता ही नहीं। एक मात्र मनुष्य गति के जीव ही संयम पाल सकते हैं। उसमें भी नीच कुलादि में , अधम देशों में , इन्द्रियों से पीड़ित , अज्ञानी, रोगी , दरिद्री , अन्याय मार्गी , विषयानुरागी , तीव्र कषायी , निंद्यकर्मी , मिथ्यादृष्टियों को भी संयम कभी नहीं होता।

इस स्थिति में यदि विचार करें तो हम पाते हैं कि हमें तो वर्तमान में सब सुसंयोग प्राप्त है , और हम थोड़ी सी विषय – लोलुपता वश ये अमूल्य मनुष्य भव यूँ ही व्यर्थ गवाँ रहे हैं। यदि हम चाहें तो अपनी कषायों को नियंत्रित करके , भोगों की लालसा पर नियंत्रण करके , रसों का त्याग करके , परिग्रह की अतिवांक्षा को नियंत्रित करके , त्रस- स्थावर जीवों की हिंसा को नियंत्रित करके वर्तमान में भी संयम पाल सकते हैं।

संयम का पालन क्यों ? –

संयम के पालन से ही सम्यकदर्शन पुष्ट होता है। संयम से ही भव-भव के दुखों से छुटकारा मिल सकता है। वास्तव में संयम ही मोक्ष का मार्ग है। वर्तमान में भी हम जितना – जितना अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करते है , उतना ही हम सुखी रहते हैं। संयम के बिना ये मनुष्य भव शून्य के बराबर है। संयम के बिना देह का धारण करना , बुद्धि का पा लेना , यहाँ तक कि ज्ञान की आराधना करना दीक्षा धारण करना भी व्यर्थ है।

ज्ञानीजन तो ऐसी भावना भाते हैं कि संयम के बिना हमारे मनुष्य भव की एक घड़ी भी व्यर्थ न हो। संयम इस भव में ही नहीं परभव में भी एक मात्र शरण है। दुर्गति रूपी सरोवर को सोखने के लिये संयम सूर्य के समान हैं। संसार परिभ्रमण का नाश संयम के बिना असंभव है। जो अंतरंग में कषायों से आत्मा को मलिन नहीं होने देते और बाहर में यत्नाचारी होकर प्रमाद रहित प्रवर्तन करते है , वे ही सच्चे संयमी है।

हम सबका जीवन भी दोनों प्रकार के संयम से सुशोभित हो ऐसी मंगल भावना है।

 

— नीरज जैन, दिल्ली


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