शरीर और आत्मा एक मेव लगती है, लेकिन है नहीं – मुनिश्री आदित्य सागर जी


इंदौर। यह शरीर और आत्मा एक मेव लगती है लेकिन हे नहीं। जिस प्रकार शरीर पर धारण वस्त्र शरीर से भिन्न हैं उसी प्रकार आत्मा भी शरीर से भिन्न है। शरीर नाशवान है, आत्मा अविनाशी है, अजर, अमर है। आत्मा में ज्ञान, दर्शन का गुण और अनुभव की शक्ति है जबकि शरीर में नहीं है। शरीर में दुख है आत्मा में सुख है।

यह बात शुक्रवार को मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज ने समोसरण मंदिर कंचन बाग में प्रवचन देते हुए कहीं। उन्होंने कहा कि कामना उसकी करो जो साथ में रहे, ऐसा काम ना करो जो साथ ना दे और ऐसी कामना भी मत करो जो काम बिगाड़ दे। यह शरीर तुम्हारा साथ नहीं देगा यह धोखा ही देगा इसका साथ मत दो। शरीर तुमसे अलग ही है, अलग ही था और अलग ही रहेगा। शरीर धर्म की साधना का साधन है इससे धर्म की साधना और जिन शासन की प्रभावना कर लो।

शरीर से उतना ही काम लो और उसे उतना ही दो जितना आवश्यक है। सिद्धतव की प्राप्ति के लिए आत्मा के गुणों को निहारो शरीर के गुणों को नहीं। इस अवसर पर मुनिश्री सहज सागर जी महाराज ने के भी प्रवचन हुए। प्रारंभ में मांगलिक क्रियाएं प्रतिष्ठाचार्य पंडित सुदर्शन जी, दिलीप जी एवं श्रीमती उर्मिला गांधी राजश्री जैन, इंदिरा लुहाडिया एवं साधना जैन ने
संपन्न की। धर्म सभा में मनोज बाकलीवाल, टी के वेद, अरुण सेठी एवं विमल गांधी उपस्थित थे ‌ संचालन श्री हंसमुख गांधी ने किया।

— राजेश जैन दद्दू


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