विशाल की निंदा करें किंतु इसके राजनीतिकरण से बचें।


प्यार में कभी कभी गाने से कैरियर की शुरूआत करने वाले विशाल ददलानी एवं एक अन्य तहसीन ने चंडीगढ़ विधानसभा में दिये गये प्रवचन के बाद जैन मुनिश्री तरुण सागर जी के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी की है। इस तरह की टिप्पणी या ऐसी सोच उनकी व्यक्तिगत सोच/राय है किंतु किसी पार्टी विशेष पर दोषारोपण करना कतई ठीक नहीं है। हां वह किसी पार्टी विशेष से जुड़े हो सकते हैं किंतु उनके द्वारा जैन संत के प्रति की गयी टिप्पणी उनकी व्यक्तिगत सोच है न कि इससे पूरी पार्टी की सोच है। इस तरह की निकृष्ट सोच से उसके आदर्श और संस्कारों का पता स्वत: चल जाता है और यह संस्कार बचपन से आ जाते हैं। हमें इसका राजनीतिकरण नहीं करना चाहिए। इसका दोष किसी विशेष पार्टी/दल पर नहीं लगाना चाहिए। ऐसी सोच रखने वालों को जीवन की कितनी समझ है पता नहीं, किंतु उन्हें इतना तो अवश्य पता होगा कि बच्चा पैदा होता है तो नंगा होता है और जब मृत्यु के बाद चिता पर जलता है तो भी नंगा होता है। यानी जन्म और मृत्यु के बीच हम बाह्य वस्तुओं से तन को ढ़कते हैं किंतु जैन मुनि सभी बाह्य चीजों/वस्तुओं का त्याग कर चुके होते हैं। इसलिए वे 36 गुण से युक्त नग्नमुद्रा को धारण किये हुए हैं। इसलिए छोटी मानसिकता के तहत अभद्र टिप्पणी करने वालों को जैन संतों की चर्या और उनके त्याग के बारे में जरूर ज्ञान अर्जित करना चाहिए ताकि उनके त्याग, तपस्या के बारे में जाने और ऐसा करने के बाद वे भविष्य में ऐसी सोच नहीं रखेंगे। हां अभद्र टिप्पणी करने वालों की निंदा जरूर की जाए किंतु इसका राजनीतिकरण न किया जाए क्योंकि ऐसा करने से हम अपने उद्देश्य से भटक जाएंगे।


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